छंगू झील (Tsomgo
Lake)
और बाबा हरभजन सिंह मन्दिर
दिनांक 31.05.2018
सुबह उठकर हमलोग जल्दी-जल्दी नित्य-क्रिया से निवृत होकर छंगू झील (Tsomgo Lake) और बाबा हरभजन
सिंह मन्दिर जाने की तैयारी में लग गए | श्रीमतिजी
और उनकी बहनजी का सबसे ज्यादा समय बच्चों के मनौव्वल में ही लग रहा था | कोई बिस्तर छोड़ने को तैयार नहीं तो, किसी को
सुबह-सुबह बम-बम नहीं करना | कोई स्नानागार
में राग छेड़े है तो कोई बिस्तर पर,
मेरे
छोटे नवाब बिस्तर छोड़ सोफे से चिपक गए, उन्हें ब्रश नहीं करना | मतलब सुबह-सुबह
बच्चे अपनी मनमानी कर अपनी माताओं का मूड ख़राब कर रहे थे और आखिर सबको एक-एक थप्पर
लगने बाद ही तैयार होने का कायकर्म अपनी पूर्णता को प्राप्त कर पाया | खैर, सबके
तैयार होने के पहले मैंने नास्ते के लिए किचन फोन लगाया तो पता चला की 8:30 के पहले ब्रेड और बटर का भी इंतजाम नहीं हो
सकता | अब क्या किया
जाये? ये सोच ही रहा
था कि ठीक 7:10 पर कमरे का
इंटरकॉम खन-खना उठा | नीचे गाड़ी और
ड्राइवर दोनों हाजिर थे | छंगू झील और
बाबा मन्दिर दुर्गम क्षेत्र हैं | वहाँ क्या उपलब्ध होगा क्या नहीं कहा नहीं जा
सकता | तभी घर से लाए गए माँ और श्रीमतीजी की सूखे नास्ते की पोटली की याद आई | जिसमें
घर के बने नमकीन, मठरी, नमकीन और मूँगफली मिक्स फ्राई चूड़ा, बिहारी स्पेशल ठेकुआ की भरपूर रसद उपलब्ध थी और
दार्जीलिंग के बचे कुछ केले और सेब भी पड़े थे | बस
फिर देर न करते हुए सुबह-सुबह हमने इसे नाश्ता और खाना समझ कर ग्रहण किया | इस बीच ड्राइवर महोदय का तीसरा कॉल भी आ चूका
था | बच्चों को
खिला-पिला हम रास्ते के झंझट से कम-से-कम दोपहर तक मुक्त हो जाना चाहते थे | ससुरजी ने रास्ते के लिये कुछ नमकीन, ठेकुआ, जूस,
बिस्किट्स, चॉकलेट आदि एक बैग में रख लिये | रास्ते में कुछ खाने-पीने को मिले न मिले, क्या
पता अगर कुछ न भी मिला तो फिर अपनी देशी पोटली तो हैं ही, भोग लगाने के लिये |
जल्दी-जल्दी करते भी हम 7:45 पर स्वागत कक्ष पहुंचे | वहाँ
पता चला की गाड़ी टैक्सी स्टैंड चली गई, क्योंकि
8 बजे से शहर के
अंदर नो-एन्ट्री लग जाती है और इसमें किसी भी तरह की कोई रियायत नहीं होती | अब ये एक और नई मुसीबत आ गई | होटल मैनेजर ने
ड्राईवर का मोबाइल नंबर, गाड़ी नंबर और खुद का नंबर देते हुए दो लड़कों को बाहर टैक्सी
तक छोड़ने के लिये भेजा, जिसने माल रोड़ से आती हुई दो गाड़ीयों में हमें बिठा दिया |
हम होशियार लोग 200 – 200 रूपये और अतिरिक्त खर्च कर टैक्सी स्टैंड पहुँचे, मतलब सुबह-सुबह चुना
लगवा लिया हमने | टैक्सी स्टैंड में इतनी सुबह भी गाड़ियों की रेलम-पेल थी | दो-तीन
कॉल करने के बाद ही हम गाड़ी तक पहुँच पाये, जो कि बिल्कुल आगे ही लगी थी | हमलोग
गाड़ी में झट से सवार हो गये, पर देखा ड्राईवर महोदय वहाँ से धीरे से खिसक लिए और
सामने छोटी सी चाय की दुकान पर इत्मिनान से खड़े होकर चाय की चुस्कियों के साथ गप्पे
मारने लगे | मुझे बड़ा अटपटा लगा, कहाँ तो हम छुटती ट्रेन की तरह इसमें सवार होकर
पैक हो गए और महाशय बड़े इत्मीनान से गप्पें मार रहें हैं | आखिर मामला क्या है ?
ये जानने के लिये ड्राईवर को बुलाया तो पता चला कि अभी हमारा परमिट नहीं आया है,
थोड़ा और इंतजार करना पड़ेगा | ये सुनकर तो जैसे हम निराश ही हो गये, पता नहीं कितनी
देर लगेगी | हमने रात में पेपर होटल में दिया ही था तो परमिट सुबह ही बननी थी |
मैं गाड़ी से बाहर निकल आस-पास निरीक्षण करने लगा |
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गंगटोक टैक्सी स्टैंड का नजारा |
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गंगटोक टैक्सी स्टैंड से दिखता सुन्दर घर |
आस-पास निरीक्षण करते वक्त मेरी नजर हमारी गाड़ी के पीछे की पहाड़ी पर गई, वहाँ एक पतली सी सीढ़ि ऊपर की ओर गई थी पर वो थोड़ी दुर जाकर मुड गई थी इस वजह से कुछ नजर नहीं आ रहा था | प्रवेश द्वार पर लगी घंटियाँ प्रमाणित कर रही थी कि ऊपर मन्दिर है | मैं ऊपर जाने का विचार कर चढ़ रहा था, सीढ़ि घुमावदार और बिल्कुल सकड़ी थी | थोड़ा ऊपर चढ रूककर वहाँ से दिखने वाले खुबसूरत वादियों का अवलोकन कर रहा था, वहाँ से दूर तक वादियों में फैला गंगटोक नजर आ रहा था | क्या सुन्दर नजारा था | अचानक मेरी नजर नीचे खड़ी हमारी गाड़ी के पर गई, सब लोग बाहर निकल इधर-उधर देख रहे थे | मैं समझ गया शायद ड्राईवर महोदय परमिट लेकर आ गये और चलने के लिये मुझे ढूंढा जा रहा था | अब ऊपर की ओर जाने का विचार त्याग वापस हो लिया | गाड़ी तक पहुँचने तक सब इधर-उधर देख रहे थे, गाड़ी में बैठने पर सब ऐसे घूर रहे थे जैसे मैं घंटों से गायब था | आज मैंने पिछली सीट पर बैठने का फैसला किया और ड्राईवर के साथ वाली अगली सीट पर ससुरजी को बिठा दिया | मेरे आगे बैठने पर मेरे बड़े राजकुमार की दादागिरी बढ़ जाती और वो मेरे साथ अगली सीट पर कब्ज़ा जमा लेते और अपने तीन भाई - बहन में से किसी और को आगे बैठने ही नहीं देते हैं | फिर मेरे छोटे राजकुमार जिनकी फरमाइश अगर पुरी न की जाए तो आसमां ही सर पर उठा लेते हैं और यहीं हाल श्रीमतीजी के बहनजी की बड़ी बेटी का था | जब चीखना शुरू करती थी तो बस पूछिए मत | आगे बैठने के लिए खीचा-तानी मेरे बड़े राजकुमार, छोटे राजकुमार और श्रीमतीजी के बहनजी की बेटी परी के बीच ही ज्यादा चलता रहा | लगभग 9 बजे थे और गाड़ी में बैठती ही गाड़ी फर्राटे मारती निकल पड़ी सड़कों की लम्बाई को अपने पहिये में समेटती, हमें सिक्किम की वादियों के अलौकिक सौंदर्य का दर्शन कराने | लगभग आधे घंटे में हमारी गाड़ी एक लंबी गाड़ियों के कतार में खड़ी थी, ड्राईवर से पूछने पर पता चला कि यहाँ चेक पोस्ट है जो 3rd Mile Check Post के नाम से जाना जाता है और छंगू झील, बाबा हरभजन सिंह मन्दिर और नाथुला जाने के परमिट यहाँ पर चेक कर ही जाने की इजाजत दी जाती है | सुबह-सुबह लंबी क़तार लगी थी गाड़ियों की, लेकिन व्यवस्था इतनी चुस्त और दुरुस्त कि 10 - 12 मिनट में ही हमलोगों ने चेकपोस्ट पार कर लिया |
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3rd Mile चेकपोस्ट पर गाड़ियों को गाइड करती सुंदरियाँ और पुलिसकर्मी |
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3rd Mile चेक पोस्ट पर परमिट चेकिंग |
ऊँचे-पहाड़ों, गहरे घाटियों
को हम तेजी से पार कर रहे
थे
| जैसे-जैसे हमारी गाड़ी आगे बढ़ रही थी, पहाड़ों और घाटियों का सौन्दर्य नवयौवना की
यौवन की तरह बढ़ता जा रहा था | आश्चर्यचकित करते ऊँचे पर्वत, दिल की धड़कन बन्द कर
देने वाले घाटियों की अथाह गहराई | कभी बिल्कुल चमचमाते सूर्यदेव की तपिस, तो कभी
अचानक से अगले मोड़ पर स्वागत करते बादलों का अथाह समुन्द्र | इन ऊँचे पहाड़ों पर,
दिखने वाले सेना के कैंप में हमारी सुरक्षा में लगे जवानों का जीवन कितना कठिन
होता होगा, ये विचार मन में बार–बार आ रहा था और मन अनायास ही उनकी सेवा भावना और
देशभक्ति के जज्बे को नमन कर रहा था | हमें पुरे रास्ते आबादी नाम की ही मिली, पर
हमारी रक्षक पुरे रास्ते तैनात मिले | रास्ते में एक जगह कुछ दुकानों सा था, जहाँ
हमारी गाड़ी रुकी | ड्राईवर ने बताया कुछ खाना-पीना हो तो यही खा लो आगे कुछ नहीं
मिलेगा और साथ में बर्फ में जाना है तो जैकेट और बूट ले लें तो अच्छा है वरना
कपड़ों के साथ जूते गीले हो जायेंगे | बर्फ में जाना हो तो सुनकर कुछ आश्चर्य हुआ,
नाथुला तो हम जा नहीं रहे और फिर भी बर्फ की बात इस मौसम में, जब मई का अंतिम दिन
है | मैंने बर्फ के बारे में और जानकारी के लिए ड्राईवर से पूछा तो बताया कि एक
जगह पर बर्फ है, लोग वहीँ मस्ती करते हैं | ड्राईवर महोदय तो पेट पूजा करने चले
गए, फिर हम भी ऊपर बने रेस्तरां में चले आए | ये एक छोटा सा रेस्तरां और जैकेट-बूट
भाड़े पर देने वाली दुकान थी | लेकिन साथ ही शराब की फुल रेंज की लॉट भी करीने से सजी
थी | हम ऊपर आये तो पता चला खाने में सिर्फ मैगी बन सकती है बाकी चिकन हैं पर राईस
बनने में समय लगेगा, आर्डर देकर चले जाएं तो आने पर चिकन और राईस मिल सकती है | हम
ठहरे घास-फूस खाने वाले, हमारे साथ सिर्फ श्रीमतीजी की बहनजी का कुनबा ही चिकन-मटन वाले थे, बाके के सारे लोग शुद्ध शाकाहारी
| कोई भी वहाँ खाने को तैयार नहीं हुआ और मुझे अभी भुख नहीं लगी थी | खाने का
कार्यक्रम तो कैंसिल हो गया, अगर मैगी ही खानी है तो वापस आकर देखा जाएगा | वैसे
मुझे खाने–पीने में इतना कुछ परहेज नहीं हैं, शाकाहारी होने के बाद भी कहीं भी खा
लेता, पर यहाँ तो खाने को कुछ था ही नहीं | थोड़ी झिझक तो होती ही है, पर घुमक्कडी
ने इतना तो लचीला तो बना ही दिया, जब कोई अन्य रास्ता न हो तो पेट कि क्षुधा
मिटाने के लिए इतना तो करना ही पड़ेगा | वहाँ गुनगुना पानी उपलब्ध था, सबने दो-दो
ग्लास गुनगुना पानी गटक लिया |
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जैकेट और बूट पहनने और थोड़ा विश्राम के बाद लिया गया ग्रुप फोटो (दल से कभी सदस्य एक साथ ) |
वादियों के मनमोहने वाले सुन्दर नज़ारे
हम भाव-विभोर हो प्राकृतिक सौन्दर्य और इश्वरीय शक्ति की इस अदभुत
रचना को निहारते अपने वाहन में बैठे आगे बढ़ रहे थे | इन अदभुत वादियों में जिन्दगी
की पहली यात्रा को यादगार बनाने और कुछ पलों को चलते-चलते कैमरे और मोबाइल से कैद
करने के लिए पीछले सीट की खिडकी के शीशे को खोल रखा था और परिणाम वही हुआ जो होना
था | जो लोग बर्फीले पहाड़ों की सैर करते रहते हैं वो समझ गए होंगे की क्या हुआ
होगा | चलो जो लोग नहीं समझे उन्हें मैं बता दूँ | एक तो हम ऊंचाई पर तेजी से बढ़
रहे थे और ठण्ड बढती जा रही थे | कल मैंने नाथुला का तापमान देखा था जो 0 और -1
डिग्री सेल्सीयस के बीच दिखा रहा था | मतलब हम अभी कम से कम 2 डिग्री सेल्सीयस में तो थे और वो भी सर्पीले
रास्तों पर तेज भागती गाड़ी की खिडकी के शीशे को खोलकर | नतीजा ये हुआ कि मुझे
चक्कर आने लगे, ऐसा महसूस होने लगा कि मैं बेहोश होने वाला हूँ | सामने गाड़ियों की
कतार दिखी जो रास्ते में रुके हुए थे, मैंने भी ड्राईवर को रुकने को बोला |
ड्राईवर महोदय यहाँ रुकने के मूड में नहीं थे और मैं अचानक से महसूस कर रहा था कि
मैं कुछ भी बोल नहीं पा रहा हूँ | अब चक्कर बढ़ते जा रहे थे और मैं बिल्कुल बेहोश ही
होने वाला था कि मुझे एक जोरदार उबकाई आई, मैंने अपना सिर बाहर निकला ही था की ओ – औ करके उल्टीयाँ हो गई | तब तक किसी का भी
ध्यान मेरी ओर नहीं था, मैंने बीच के सीट पर मेरे आगे बैठी माताश्री को थपथपा कर गाडी
रुकवाने का इशारा किया | उन्होंने मुड़कर मेरी हालत देखी और गाड़ी रुकवाई | सडक किनारे
गाड़ी खड़ी होते ही मैं दरवाजा खोलकर बाहर कूद पड़ा | बाहर आकर कुछ देर खुली हवा में
लंबी-लंबी साँस ली और थोड़ा चहलकदमी की | पानी से कुल्ला किया, थोड़ी देर में आराम
लगने लगा | अब रुक ही गए थे तो आसपास नजर दौडाई, गाड़ियों की लंबी कतार लगी थी जो
वहाँ पर रुके थे | पता चला हमलोग क्योंगनोस्ला वाटरफाल के पास रुके हैं और सबलोग
चाय, काफी के साथ पेट-पूजा के लिए रुके हैं | हमलोग क्योंगनोस्ला वाटरफाल को देख
वापस आ गए | सड़क किनारे काफी ऊंचाई से पतला सा वाटरफाल, लोगों की भीड़ फोटो सेशन के
लिए उमड़ी पड़ी थी |
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क्योंगनोस्ला वाटरफाल के पास गाड़ियों की कतार |
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(Kyongnosla Water Fall) क्योंगनोस्ला वाटरफाल के साथ लिया गया फोटो |
वापस फिर आगे की सीट ससुरजी ने छोड़ दी, आप आगे ही बैठिये पीछे चक्कर
आ रहा है कहकर | यात्रा फिर शुरू हुई, हम कितनी ऊंचाई पर आ चुके थे इसका एहसास
पहाड़ों को देखकर हो रहा था | इन दुर्गम पहाड़ों पर जीवन के प्रतीक पेड़-पौधों का
नामो-निशान नहीं था, कहीं-कहीं रास्ते में याक और पहाड़ी बकरियों को देख मन
उत्सुकता से भर उठता ये जानने के लिये कि आखिर इनका भोजन क्या है ? क्योंकि झाड़ी-पौधे
तो कहीं दिख ही नहीं रहे थे | शायद पत्थरों के बीच छोटे-छोटे चंद पत्तियों वाले
घास हों जिनको खाकर ये अपना पेट भर लेते हों | यहाँ मवेशियों की संख्या भी कुछ
ज्यादा नहीं दिखी रास्ते में | हमें अब लगभग समतल जैसे जगह दिखने लगी थी, इससे
अंदाजा लगा कि हम ऊपर आ गए हैं | दुर से ही उड़न खटोला दिखने लगा, ड्राईवर ने बताया
हम छंगू झील (Tsomgo Lake) पहुँचने वाले
हैं, एक घुमावदार रास्ता पार होते ही सामने बड़ी सी झील | क्योंगनोस्ला वाटरफाल से छंगू
झील (Tsomgo Lake) पहुँचने में लगभग 15
– 20 मिनट
लगे होंगे | हमलोग वापसी में छंगू झील रुकने का मन बना आगे निकलते हुए छंगू झील (Tsomgo Lake) के मनोरम
दृश्य का आनन्द ले रहे थे |
छंगू झील (Tsomgo Lake) से बाबा हरभजन
सिंह मन्दिर लगभग 16 – 17 किलोमीटर की
दुरी पर होगी, जिसे हमें आधे से एक घंटे में पार कर लेना चाहिए | पर हमें दो घंटे
से भी अधिक समय लगे | वो कैसे, चलिए बताता हूँ | हम कुछ ही आगे बढ़े थे एक छोटी सी
झील फिर दिखाई दी, जहाँ गाड़ियों की लंबी कतार लगी थी | हमारी भी गाड़ी कतार का
हिस्सा बन गई, मैं गाड़ी से बाहर आकर फोटो लेने लगा झील के पीछे के ऊँचे पर्वत पर
अभी भी बर्फ जमीं थी | बड़ा ही सुन्दर
नजारा था, ड्राईवर महोदय भी बाहर आ गए | उनसे झील का नाम पूछा तो न जाने उसने क्या
बोला कुछ समझ नहीं आया | हमारे पीछे जो गाड़ी थी उसके ड्राईवर महोदय बड़े चाव से
अपने यात्रियों को वहाँ के बारे में बता रहे थे | मैं उनके पास पहुँच गया झील का
नाम जानने, उसने बताया इस झील का नाम मंजू झील है | था तो छोटा सा झील, पर हम जहाँ
खड़े थे वहाँ से वो बहुत ही खूबसूरत दिख रहा था | झील तीन ओर से ऊँचे पर्वतों से
घिरा था, जिसपर मई के अंतिम दिन भी बर्फ नजर आ रही थी | ये झील छंगू झील (Tsomgo Lake) से ऊपर थी, मतलब
तीनों ओर से बर्फ पिघल कर यहाँ पानी जमा होती होगी और फिर जब ये छोटा सा झील भर
जाता होगा तो पानी अपना रास्ता बनाती हुई छंगू झील (Tsomgo Lake) तक का सफर तय
करती और छंगू झील (Tsomgo Lake) में विलीन हो
जाती होगी | ये मेरा अपना अंदाजा था, अब पता नहीं कितना सही है | अगली बार इसकी
पुष्टि जरूर करूँगा | यहाँ हमें आधे घंटे से भी ज्यादा समय तक इन्तजार करना पड़ा,
फिर धीरे-धीरे गाड़ी रेंगने लगी |
थोड़ा आगे जाने पर पता चला कि रास्ते में एक पर्वत पर बर्फ जमीं है जो
बिल्कुल ही रास्ते तक फैला है और आते-जाते लोग वहीँ लोटपोट हो रहें हैं, जिसकी वजह
से ये जाम सा लगा था | हम कौन से विरले थे, हमने भी अपनी गाड़ी रुकवाई और उछलते-कूदते,
हर्ष-उल्लास से जमीं बर्फ के पास पहुँच गए | कुछ ही जगह पर साफ-सुथरी बर्फ बची थी
और उसपर चढने में भी लोग लुढक रहे थे | कोई थोड़ा ऊपर ही चढ़ा कि सु.....सु.....
ई..... ई..... नीचे, कोई नीचे आते-आते ऊपर चढ़ने वाले को भी नीचे लेकर आ गया
सु.....सु..... ई..... ई..... धडाम | मजा तो बड़ा आ रहा था ये सब देखकर और जब कोई
ऊपर से नीचे लुढकते-फिसलते गिरता तो बच्चों की हंसी, किलकारी और तालियों से उसका
स्वागत होता | अब हमारी बारी थी, चढ़ने वालों की हालात देख कोई पहले जाने को तैयार
नहीं | आखिर कौन सबकी हंसी का पात्र बने | फिर मैंने सबको बर्फ में कैसे चले और
ऊपर चढ़े समझाया | जो मैंने खुद तुरंत ही दिमाग लगाकर किया था | मैंने देखा जब हम
अपने बूट के अगले हिस्से यानि को थोडे जोर से पहले रखते हैं तो उसकी वजह से बर्फ धस
जाती है और बूट बड़े आराम से सेट कर जाता और स्लीप नहीं कर पाता | अब ये तरीका सही
था या नहीं पता नहीं, पर यहाँ तो हमारा काम हो गया और मेरे बताए तरीके से
धीरे-धीरे सब लोग ऊपर की ओर चढ़ गए और फिर शुरू हुआ मौज-मस्ती, अठखेलियों का
सिलसिला | एक घंटे तक हम बर्फ के खंडहर में लोटपोट होते रहे | क्या कहा आपने पहले
कभी “बर्फ का खंडहर” नहीं देखा, चलो
मैं बताता हूँ | मई महीने के अंतिम दिन, बारिस के बाबजूद भी बची-खुची बर्फ देखने
को मिले जाए तो इसे बर्फ का खंडहर ही तो कहेंगे ना बाबा, समझे कि नहीं | फोटो पर
फोटो, स्टाइलिश पोज, एक दूसरे पर बर्फ के गोले दागने, बर्फ में लोटपोट,
गिरने-फिसलने का सिलसिला चलता रहा | मतलब जो भी पागलपन हो सकता था, हमने किया बर्फ
में |
ऊपर भी मजेदार सीन था, लोग जैसे तैसे चढ़ तो गए पर नीचे आते वक्त लुढकते
और फिसलते नीचे पहुँच रहे थे | मैं ऊपर
चढ़ने के बाद एक-दो बार नीचे आया बच्चों को लेने, अब आलम ये हो गया कि आसपास मौजूद
महिलाएं मुझसे विनती करने लगी नीचे तक छोड़ आने की | एक-दो को तो सहारा देकर नीचे
छोड़ दिया और ये सिलसिला बन गया | अब इससे बचने के लिए मेरे कुराफाती दिमाग में एक
आईडिया आया या यूं कहें थोड़ी मस्ती चढ़ गई | एक टिप-टॉप महिला मेरे पास आई देखिये
क्या हुआ –
महिला – “आप कैसे चल लेते
हैं बर्फ पर बिना फिसले, बाकी सब तो लुढक रहे हैं |”
मैं
– “बिल्कुल भी मुश्किल नहीं, बस चलने के पहले पैर धसा ले बर्फ में, बस हो
गया |”
महिला
ने कोशिश की पर डरकर, इस वजह से वो कामयाब न हुई और गिरने लगी |
फिर मेरी तरह
मुड़कर-
महिला
– “कृप्या मुझे भी नीचे छोड़ दीजिए, मुझे डर लग रहा है |”
मैं
– “मैं आपको एक आसान तरीका बताता हूँ, मजा भी खुब आयेगा और बिना गिरे आप
खुद-ब-खुद नीचे पहुँच जाएँगीं |”
फिर
क्या था मैंने अपने कुराफाती दिमाग में उपजे आईडिया का परिक्षण कर लिया | मैंने उस महिला
को बर्फ पर ऊपर से बैठकर ही नीचे फिसलने का जबरदस्त आइडिया दे डाला और ये जानकर
आश्वस्त हो ली कि चोट नहीं लगेगी |
बस उसके बाद तो बस पूछिए मत, वो महिला सु.....सु..... ई..... ई.....
करते नीचे चली गई और हमारा हँसते-हँसते बुरा हाल हो रहा था | लेकिन इसी बीच और
मजेदार वाकया हुआ, श्रीमतीजी की बहनजी भी सु.....सु..... ई..... ई..... करते नीचे
पहुँच गई और फिर देखते-देखते कई और भी लोग ऐसा ही करने लगे और वहाँ बस
सु.....सु..... ई..... ई.......... सु.....सु..... ई..... ई..... और
सु.....सु..... ई..... ई..... ही होने लगा | उसके बाद ये हालत हो गई कि जो
नीचे जाने से डर रहे थे फिर से ऊपर आ गए और फिर सु.....सु..... ई..... ई..... नीचे
| मतलब अब ये सु.....सु..... ई..... ई..... मस्ती का माध्यम बन गया और हमारा
हँसते-हँसते पेट फटने ही वाला था | मतलब एक घंटे तक हमारा भरपूर मनोरंजन होता रहा,
खास कर बच्चों का और वो भी बिल्कुल टैक्स फ्री |
फिर हम चले पड़े बाबा हरभजनसिंह मन्दिर की ओर, शायद 15 मिनट चले होंगे कि हमें फिर से एक बेहद खूबसूरत
झील नजर आई, झील की सुंदरता में किनारे-किनारे चलते पैडल बोट चार चाँद लगा रहे थे
| अगर स्वर्ग कहीं होगा तो शायद ऐसा ही होगा जैसा हम अपनी आँखों से यहाँ देख पा
रहे थे | लगभग एक किलोमीटर लंबा यह हंगू झील (Hangu Lake) चारों ओर ऊँचे पहाड़ों से घिरा था, जी हाँ सही सुना आपने छंगू झील
के बाद अब ये हंगू झील, जिसका पता इस पोस्ट को लिखते समय मैप देखकर लगा | उस वक्त
तो हंगू झील (Hangu Lake) के आकर्षण ने
ऐसा बांधा कि हमें कुछ भी जानने-समझने की सुध ही न रही, इतना आकर्षित तो मुझे छंगू
झील ने भी नहीं किया | पता नहीं क्या और कैसे हुआ, ससुरजी से बातचीत के क्रम में
मेरे मुख से निकल पड़ा –
“पापाजी आप
मन्दिरों में
घंटा-घरियाल बजाते रहिए जिन्दगी भर,
कुछ नहीं मिलने वाला | यहाँ देखिए
साक्षात् इश्वर लाइव हैं,
अपनी बाहें फैलाए |”
यहाँ
कुछ ऐसा अनुभव हुए, जिसे शब्दों में बयां करना मेरे कूबत के बाहर है | एक बड़ी सी चट्टान
में साक्षात् भोलेनाथ हों, ऐसा अनुभव मुझे काफी देर तक होता रहा | ये क्या हुआ या
क्या था, मेरे समझ से परे था | विचारशून्यता की अवस्था में कब और कितनी देर में बाबा हरभजनसिंह
मन्दिर पहुँच गए पता ही नहीं चला |
न चाहते हुए भी यह वृतान्त लंबी हो रही है, मैंने सोचा था इसे इसी
कड़ी में समाप्त कर दूँगा पर हो न सका |
छंगू झील (Tsomgo Lake) जाने के दौरान लिये गए अन्य फोटो →
इसे भी पढ़े:
दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 2
आगे जारी ...
छंगू झील (Tsomgo Lake) जाने के दौरान लिये गए अन्य फोटो →
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वादियों के रमणीय दृश्य |
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वादियाँ ऐसी जहाँ जिन्दगी थम सी जाए |
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मंजू झील के पर्वत पर जमीं बर्फ |
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क्योंगनोस्ला वाटरफाल |
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क्योंगनोस्ला वाटरफाल के पास लगी लंबी कतार गाड़ियो की |
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टैक्सी स्टैंड के दुर दिखता सुन्दर पर्वत बादलों के झुंड के साथ |
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नाथुला और बाबा हरभजनसिंह मन्दिर को अलग होते रास्ते, नाथुला वाले रास्ते से ही नया रास्ता प्रारंभ हुआ है कैलाश मानसरोवर यात्रा को |
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पहाड़ी रास्ते |
Bachho को सुबह सुबह तैयार करना बहुत ही मेहनत का काम है....200 rs 8 बजे से late निकलने पर...सिक्किम बहुत ही अनुशासित है...आपको जो उल्टियां हुई फिर हल्का लगा होगा...गाड़ियों की लंबी कतार और यह जन्नत...बढ़िया यात्रा भाई...
ReplyDeleteबच्चों के साथ यात्रा करने में थोड़ी परेशानी तो रहती ही है | सिक्किम बहुत ही अनुशासित प्रदेश है , यहाँ लोग नियमों का पालन ही नहीं करते बल्कि उसे अपना कर्तव्य मानते हैं | सफाई ऐसी जैसे हम स्वर्ग में पहुँच गये हों |
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