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Friday, 5 July 2019

भागलपुर से नैनीताल की यात्रा - Bhagalpur To Lake City Nainital

नैनीताल यात्रा  भाग – २



आखिर गर्मी की छुट्टियों का दिन आ गया, गर्मियों की छुट्टियों मतलब बच्चों के घुमक्कडी का सबसे बेहतरीन समय. सूर्यदेव के कहर से लोग त्राहिमाम कर रहे थे और हम नैनीताल के लिए निकल रहे थे. हम पहले भागलपुर (लूप लाइन पर स्थित) से किउल (कोलकत्ता-दिल्ली मेन लाइन) रात्रि 02:45 बजे फरक्का एक्सप्रेस से पहुंचे, जो लगभग 100 किलोमीटर दूर था. रात्रि की यात्रा थी, इसलिए इसमें भी हमें आरक्षण करवा रखा था. ढाई घंटे इंतजार के बाद किउल से सुबह 05:15 बजे बाघ एक्सप्रेस से, नैनीताल के सुहाने सफर पर निकल पड़े. भागलपुर से नैनीताल की यात्रा 1230 किलोमीटर लंबी थी.


ट्रेन का सफर, घर के बने पराठे-सब्जी, लिट्टी, चुडा-छोले, मिठाई, कुकीज और स्पेशल केक और न जाने क्या-क्या खाते-सोते और ट्रेन की खिडकी से तेजी से भागते दृश्यों को देखते बीता. हाँ, साथ ही छोटे कुमार के कई उलझे-सुलझे सवाल भी थे- “पापा, नैनीताल काली पहाड़ जैसा जितना ऊँचा और बड़ा होगा न? मम्मी तो बहुत सारा सामान ले ली है, हमलोग पहाड़ पर इतना सामान लेकर कैसे चढेंगे?”




चार साल के छोटे कुमार दार्जिलिंग, सिक्किम तो घूम ही चुके, तीन साल की उम्र में दो बार मंदारहिल की लगभग दो किलोमीटर की ट्रेक के साथ राजगीर के पहाड़ी की ट्रेक भी छः साल के बड़े भाई के साथ कर चुके. पर उनकी नजर में नानाजी के शहर जमालपुर की काली पहाड़ सबसे ऊँची है. आपलोगों को फिर कभी जमालपुर के बारे में भी बताऊंगा.

काठगोदाम रेलवे स्टेशन 

काठगोदाम रेलवे स्टेशन के बाहर का दृश्य 


सुबह हल्द्वानी पहुँचने पर अपना सामान समेटा, आधे घंटे लेट होकर ट्रेन 10 बजे काठगोदाम स्टेशन पर खड़ी थी. स्टेशन से बाहर टैक्सी वालों की मनमानी देख लगा, बेहतर होता हल्द्वानी ही उतर जाता. हल्द्वानी स्टेशन से बाहर ही नैनीताल के लिए टैक्सी, शेयर टैक्सी, बस आसानी से मिल जाते हैं. काठगोदाम स्टेशन से मुख्य मार्ग थोड़ी दूर है, अगर बस लेना हो तो सामान लेकर सड़क तक जाना मुसीबत है. खैर, एक टैक्सी ली और चल पड़े अपने सपनों के मंजिल की ओर, काठगोदाम से नैनीताल लगभग 35 किलोमीटर की दुरी पर है. सपनों ने अपने पुरे पंख फैला दिए और सपनों की उड़ान के बीच बच्चों की हंसी-ठिठोली और वादियों का अनुपम सौंदर्य एक अनोखा एहसास दिला रहा था.

पहला पड़ाव था- पकोड़े और चाय की दुकान. पर चाय किसी को पीनी नहीं थी तो सिर्फ गर्मागर्म पकोड़े लेकर चल पड़े. पकोड़ों का स्वाद हमने खूबसूरत वादियों के साथ गाड़ी में ही लिया. दुकान पर देखा था हमारे आगे जाने वाली गाड़ी की महिलाएं नीबूं काटकर उसपर नमक लगाकर चाट रही है, तो पता चल गया आगे पहाड़ों पर होने वाला उबकाई, चक्कर का समय आने वाला है. रास्ते में श्रीमतीजी को थोड़ी उबकाई आई तो हमने गाड़ी को साइड में रुकवाई और थोड़ी देर रूककर नजारों का आनन्द लिया. बच्चों को चाकलेट और हमने हाजमोले का चटकारा ले  लिया, ताकी रास्ते में और उबकाई न आये. जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, गर्मी कम होती जा रही थी और हवा में ठंडक और ताजगी बढती जा रही थी. पुरे रास्ते हमारी नजर गाड़ी की खिडकी के बाहर के नजारों-पहाड़ों-खाइयों को ही देखती रही. मुड़ती सड़क पर जब गहरी खाइयाँ दिखती तो जान हलक में आ जाती, छोटे कुमार जो मेरे साथ आगे की सीट पर जमे थे डर के मारे पीछे की सीट पर भाग लिए और अगली सीट खाली होते ही बड़े कुमार आ जमे थे मेरी गोद में.




वादियों में कुछ घर दिखने लगे थे, हमने अंदाजा लगाया कि हम नैनीताल पहुँच गए. बस स्टैंड से आगे बढते ही नैनी झील दिखने लगी. वाह क्या नजारा था, तीनों ओर से पहाड़ों से घिरा बीच में बेहद खूबसूरत झील. झील में तैरते बोट को देख बच्चों का हर्ष चरम बिंदु पर था और वो तो जैसे गाड़ी से कूद ही पड़ते. सामने दो सुन्दर और साफ-सुथरी सड़क नजर आ रही थी, जो वन-वे थी. मतलब जाने और आने के लिए अलग-अलग सड़क, यही नैनीताल का प्रसिद्द मॉल रोड था, जिसने जाने कितने लेखकों, कवियों और शायरों को अपना दीवाना बनाया. तीनों ओर की पहाड़ियों पर सैकड़ों होटल के साथ ही लोगों के घर भी थे. पैदल चलने के लिए झील के साथ-साथ सुंदर रास्ता बना था. मॉल रोड के निचले रोड पर थोडा आगे जाकर ड्राईवर ने एक जगह गाड़ी रोक दी और सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा किया- “वो सामने रहा आपका गेस्टहाउस”. बोर्ड तो हमें भी दिख रहा था, सो बोरिया-बिस्तर लेकर कूद पड़े.


नैनी झील 

हमें क्या पता था आते ही हमारा एडवेंचर शुरू होने वाला है, हम दोनों सड़क को पार कर बोर्ड वाले जगह पहुंचे तो वो सड़क दूर तक बिलकुल ऊंचाई पर जाती दिख रही थी. ऊपर जाती सीधी सड़क को देख कर ही गला सुख गया. चढ़ना तो था ही चाहे जैसे चढ़े, सीधी सड़क पर सामान के साथ चढ़ते दम निकल गया, हमारे साथ बच्चे भी हांफ रहे थे. गिरते-पड़ते ऊपर पहुँच कर बड़ी सी पार्किंग में खड़ी गाड़ियों को देखा तो अनायास ही ड्राईवर की धूर्तता पर दिमाग उबल पड़ा और ड्राईवर के लिए दो-चार गालियाँ निकल पड़ी. ऊपर पहुँच कर दस मिनट बाद ही जान-में-जान आई, उसी समय एक गाड़ी ऊपर आई, तो फिर ड्राईवर को दो-चार दे डाली.


धूर्त गाड़ी वाला 

हमलोग नैनीताल पहुँचते ही जिस ड्राईवर की चालाकी का शिकार हुए, उस गाड़ी को आप भी देख लो. जब भी नैनीताल जाओ, इस गाड़ी में भूल कर भी मत बैठना. ऐसे लोग ही पर्यटन स्थल का नाम बदनाम करते हैं, जब पैसे पुरे लिए पहुँचाना भी बिलकुल सही जगह पर था.


जब होशो-हवास वापस आया तो गेस्टहाउस की लोकेशन और वहाँ से दिखते शानदार नजारों ने मोहित कर दिया. सामने बड़ी सी पार्किंग, दो मंजिले गेस्टहाउस में उपरी मंजिल की छत लकड़ी की बनी थी, जो बेहद खूबसूरत दिख रही थी. कमरे के सामने नजारों का आनन्द लेने के लिए बरामदा, कुल मिलकर गेस्टहाउस सबको पसंद आया.  सामान एक जगह रख स्वागतकक्ष जाकर अपने आगमन की सूचना दी और औपचारिकता पूरी की, दो लड़कों को रूम की सफाई के लिए साथ भेजा गया. हमारा कमरा दूसरी मंजिल पर था, जो पहले से ही हमारे नाम आरक्षित था. बरामदे से सामने नैनी झील और पहाड़ का बेहतरीन नजारा दिख रहा था.


गेस्ट हाउस 

सफाई के बाद कमरे में सामान जमाया और थोडा आराम करने के बाद स्नान कर आसपास विचरण करने और लंच करने के विचार से निकलने वाले थे कि मेघराज ने गरजना शुरू कर दिया. गेस्टहाउस में ब्रेकफास्ट और डिनर प्री-आर्डर पर ही बनता है, दिन में गेस्ट रहते नहीं तो खाना भी नहीं बनता. हम इंतजार करते रहे कि शायद बारिस रुके और हमें कमरे से निकले पर मेघ गरजते-बरसते रहे. आखिर में अपने पास उपलब्ध खाने-पीने के सामान से ही पेट पूजा की और बरामदे से काफी देर तक बारिस में झील और पहाड़ों की खूबसूरती को निहारता रहा. मैं सिर्फ हाफ टी-शर्ट में था, ठण्ड के मारे कपकपी छुट रही थी. रात के खाने का आर्डर लेने वाले लड़के ने बताया बारिस तीन दिनों से हो रही है, जिसके वजह से ठण्ड काफी बढ़ गई है.


दरबाजे पर दस्तक से नींद खुली, गर्मागर्म डिनर हाजिर था. घडी देखी तो रात के दस बज रहे थे. हमलोग घर में रात्रि का खाना सात बजे तक खा लेते हैं, पर यहाँ इतनी देर हो गई. कल से खाना थोडा पहले देने को बोल पेट में उछलते-कूदते चूहों को शांत किया. कपकपाती ठण्ड में गर्मागर्म तवा रोटी के साथ मटर-पनीर और अरहर दाल का तड़का खाकर जो आनन्द और तृप्ति मिल रही थी, उसे बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. खाना-खाकर बरामदे से मौसम का जायजा लिया, बारिस फिर शुरू हो गई थी.

आखिर और कोई उपाय न देख हम अपने “अजगर और गैंडे की तरह पड़े रहने वाले” मिशन पर लग गए और मोटी-मोटी रजाई में घुसकर लंबे हो गए.

आज नैनीताल में होकर भी नैनीताल न देख पाने का मलाल दिल में लिए, न मालूम कब नींद के अपने आगोस में चले गए.


आप भी सो जाओ, आगे फिर अगली किस्त में.

शुभ रात्रि.    

Thursday, 4 July 2019

तालों का शहर - नैनीताल

नैनीताल यात्रा  भाग – १ 

फरवरी के चिलचिलाते ठण्ड में हमारे घर में चर्चा गर्म थी – “गर्मियों की छुट्टियों में कहाँ जाया जाए???”
सब अपनी-अपनी राय बड़े उत्साह के साथ पेश कर रहे थे, आखिर मौज-मस्ती तो सबको करनी थी. कभी कन्याकुमारी और रामेश्वरम, तो कभी फिर से सिक्किम, कभी हिमाचल तो कभी ऐसे सी कुछ. अब आप सोच रहे होंगे ये लोग चिलचिलाते ठण्ड में गर्मियों की छुट्टियों की प्लानिंग क्यों कर रहे हैं? असल में हमारे यहाँ ट्रेन सीमित और ट्रेनों में भीड़ अत्यधिक है, तो कभी भी ट्रेन में आरक्षण जब आप चाहेंगे तब मिलेगी नहीं, रेलवे के  चार महीने पहले आरक्षण करवाने की सुविधा भी दुविधा में डालने वाली है. आप भी अपनी प्लानिंग में हमेशा इस बात का ध्यान रखें, नहीं तो सिर्फ हाथ मलने के कुछ न मिलने वाला.



काफी सोच-विचार के बाद प्लान तैयार था तालों का शहर- नैनीताल का. डेस्टिनेशन हमें मिल चूका था, ट्रेन में आरक्षण की स्थिति और होटल के सर्वे करने में दो-तीन दिन निकल गए. हमारे यहाँ से सीधी ट्रेन की सुविधा थी नहीं. हमें पहली ट्रेन से भागलपुर से किउल और फिर दूसरी ट्रेन बदल कर काठगोदाम पहुंचना था, वहाँ से सड़क मार्ग से नैनीताल.

ट्रेन की स्थिति ऐसी थी कि मई की यात्रा के लिए फरवरी में ही वेटिंग. हमें चार सीट चाहिए थी, पर जून की पहली सप्ताह तक वेटिंग देखते-देखते कई बार मन में विचार आया कि प्लान कैंसिल कर दूँ, क्योंकि बच्चों के स्कूल से मार्च के अंत में डायरी मिलेगी जिसमें छुट्टियों का व्योरा होगा और तब तक सीटें रिग्रेट हो जाने वाली थी. फिर मैंने तुक्के में पिछले वर्ष जिस तिथि को बच्चों की छुट्टी हुई थी, उसी तिथि को आरक्षण करवा लिया. संयोग से यही एक तिथि थी, जब सीट उपलब्ध थी. अब जब तक बच्चों को स्कूल से नए सत्र की डायरी नहीं मिल जाती तब तक गहरा सुस्पेंस और थ्रिल बन गया.

होटल हमेशा अपनी डेस्टिनेशन पहुंचकर ही लेता रहा हूँ, पर पिछली गर्मियों में दार्जिलिंग और गंगटोक में होटलों ने जरूरत से ज्यादा ही जेबें काटी, तो इस बार फिर जेब न कट जाए पहले से सचेत था. कई सारे विकल्प कैम्प स्टे, भीमताल, भवाली और आसपास का विकल्प देख रहा था, जहाँ होटल सस्ते थे. खुशकिस्मती से नैनीताल में हमारे नियोक्ता का आलीशान गेस्टहाउस का पता चला, तो उसमें ही नियत समय में बुकिंग कर ली. पर वो भी आसान न था, सारी प्रोसेस ऑफलाइन और पुराने तौर-तरीके से हुई तो दो महीने लग गए ये बता चलने में कि हमें कमरा मिल भी रहा है या नहीं. खैर, अंत भला तो सब भला.

बच्चों की स्कूल डायरी मार्च के अंत में मिल चुकी थी और बस ये समझ लो उपरवाले ने लाज रख ली. जिस दिन रात को ट्रेन थी, वही स्कूल का आखरी दिन था और अगले दिन से गर्मियों की छुटियाँ शुरू हो रही थी. बाल-बाल बचे. यह यात्रा मैंने अलग तरीके से प्लान की थी. हर यात्रा में खूब भागा-भागी होती है, पर नैनीताल में हम सिर्फ खाकर अजगर और गैंडे की तरह पड़े रहने वाले थे, मतलब नैनीताल में – “मस्ती और सुस्ती के पांच दिन”.



बने रहिए, आपको बताएँगे, हमने पांच दिन अजगर और गैंडे की तरह कैसे बिताए.

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