यायावर एक ट्रेवलर अपने नए डोमेन के साथ, नए कलेवर में यहाँ उपलब्ध है :

Sunday, 4 August 2019

नैनीताल चिड़ियाघर की सैर

तालों का शहर नैनीताल – Lake City Nainital  भाग

तालों का शहर नैनीताल में आज हमारा दूसरा दिन है. पिछले भाग में आपने पढ़ा हम माँ नयना देवी के दर्शन कर रोपवे से बैरंग लौटकर चिड़ियाघर की सैर को चले गए. आगे पढ़िए -
चिड़ियाघर की सैर के लिए बच्चे काफी उत्साहित थे. चिड़ियाघर के लिए शटल 20 – 25 मिनट इंतजार के बाद ही मिल पाया, रविवार की वजह से अच्छी भीड़ थी. शनिवार-रविवार ने हमें कई और जगहों पर भी परेशानी में डाला है. हमने फरवरी में एक ट्रिप की थी गया-बोधगया-राजगीर की. राजगीर में हमलोग रविवार को बिहार बोर्ड परीक्षा के अंतिम दिन फंसे, परीक्षार्थियों की भीड़ ने हमारे ट्रिप की बैंड बजा दी. कुछ देख पायें, कुछ नहीं वाली हालत में राजगीर से विदा लिया. जब भी मैं फॅमिली के साथ ट्रिप प्लान करता हूँ ये जरूर ध्यान रखता हूँ कि रविवार को ट्रेन में ट्रेवल न करूँ. कई बार ट्रेन में विभिन्न कॉम्पिटिशन के परीक्षार्थियों की वजह से बहुत बुरा फंसा हूँ. आगे से ट्रिप प्लान करते वक्त इस बात का भी ध्यान रखूँगा की पूरी ट्रिप में शनिवार और रविवार न ही पड़े तो भला. वीकेंड हमारी पूरी ट्रिप की ऐसी-तैसी कर देते हैं. हमने शटल की चार सीटें बुक की थी, बोलेरो खाली होते ही हम कूद-फांद कर बीच की सीट पर कब्ज़ा जमा लिया. छोटे कुमार श्रीमतिजी के गोद में पसर लिए और गाड़ी बिल्कुल खड़ी चढाई पर चल पड़ी. चिड़ियाघर की चढाई माल रोड से लगभग दो किलोमीटर रही होगी. पतली सी ऊपर की ओर जाती सड़क पर गाड़ी झटके देती जा रही थी. क्या कहूँ फुल पिछवाड़ा मसाज हो गया, एक बार तो ऐसा लगा कि गाड़ी के साथ हम वापस नीचे पहुँचने वाले हैं. सच कहूँ तो हम गाड़ी में बैठे नहीं, डर के मारे गाड़ी को पकड़ लटके थे. दस-बारह मिनट की शटल की यात्रा किसी एडवेंचर से कम नहीं थी. खैर, जब गाड़ी रुकी तो जान में जान आई और सब के सब गाड़ी से ऐसे कूदे जैसे कोई भूतिया शो देख लिया हो.
सड़क पर बैरियर लगा था, इसके आगे गाड़ी नहीं जा सकती. इधर-उधर नजर दौडाया, आसपास चिड़ियाघर तो क्या एक चिड़िया भी नजर न आ रही थी. बाकि लोग आगे जा रहे थे तो हम भी चल दिए. चिड़ियाघर के गेट तक की खड़ी चढाई ने हालत पतली कर दी, सामने गेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- गोविंद बल्लभ पन्त उच्च स्थलीय प्राणी उद्यान, नैनीताल. जिस पहाड़ी पर चिड़ियाघर है उस पहाड़ी का नाम शेर का डांडा (Tiger's Ridge) हैं, जो नैनीताल के सात पहाड़ियों में से एक है और ऊंचाई 2217 मीटर यानि 7274 फीट. अब समझ आ रहा था हमारा गेस्ट हाउस कैलाश पर्वत समान क्यों लग रहा था. हम भी इसी शेर का डांडा (Tiger's Ridge) पहाड़ी पर डेरा-डंडा डाले हैं.

गोविंद बल्लभ पन्त चिड़ियाघर, नैनीताल
नैनीताल चिड़ियाघर का नाम गोविंद बल्लभ पन्त उच्च स्थलीय प्राणी उद्यान है जो भारत में मौजूद चंद गिने-चुने उच्च स्थलीय चिड़ियाघर यानि हाई एल्टीट्यूड ज़ू (High Altitude Zoo) में से एक है, इसकी ऊँचाई 2100 मीटर यानि 6890 फीट है. वैसे तो माल रोड पर आते-जाते आपको चिड़ियाघर का बोर्ड नजर आ जाएगा, पर गलतफहमी में मत आना कि पास में ही है. गोविंद बल्लभ पन्त उच्च स्थलीय प्राणी उद्यान शेर का डांडा की पहाड़ी पर माल रोड से लगभग 2 किमी उपर स्थित है, पीछे शेर का डांडा पहाड़ी पर घना जंगल है. 4.693 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले चिड़ियाघर की स्थापना उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र के वन्य जीवन और जैव विविधता के संरक्षण और सुरक्षा के उद्देश्य से सन 1984 की गई, जो लगभग 11 साल के बाद 1 जून 1995 को जनसामान्य के लिए खोला गया. श्रीमतिजी हमारे लिए टिकट लेकर आ गई थी, टिकट दर इस प्रकार है -
चिडियाघर की टिकट
प्रति व्यक्ति – 100 रूपये (13 वर्ष से  60 वर्ष के लिए)
प्रति बच्चे -  50 रूपये (5 वर्ष से 12 वर्ष के लिए)
वरिष्ठ नागरिक एवं दिव्यांगों के किये प्रवेश निशुल्क हैं.
विदेशियों के लिए - 200 रूपये
विदेशियों बच्चों के लिए – 100 रूपये

छात्रों के लिए विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून), चिड़ियाघर स्थापना दिवस, ओजोन दिवस (16 सितम्बर) और वाइल्ड लाइफ वीक (11-15 मार्च) के दौरान प्रवेश निशुल्क होता है.
प्रत्येक गुरुवार, 26 जनवरी, 15 अगस्त, होली और दीपावली को चिड़ियाघर बंद रहता है।

टिकट लेकर चल पड़े और ऊपर की ओर, मतलब ऐसा लग रहा था कि आज हम बादल तक तो पहुँच ही जाएंगे नैनीताल चिड़ियाघर देखते-देखते. हर स्टेप ऊपर की ओर ही जा रहा था और ऊपर ... और ऊपर..... फिर सबसे पहले हमने पक्षियों को देखा  – बच्चे रंग बिरंगे तोते, सिल्वर पैयिएन्ट्स, मोर और सफ़ेद मोर के साथ कई पक्षियों ने बच्चों को बहुत देर तक बांधे रखा. जब आगे बढ़ने को हुए तो तोते के जोड़े का प्यार का अफसाना शुरू हो गया, सफ़ेद मोर ने पंख फैला नाचना शुरू कर दिया. बच्चे मोर का नाच देखने थम से गए और खूब तालियाँ बजाई. मोर ने नाचना बंद किया तो नन्हें कुमार ने बोला एक बार और, सच में सफ़ेद मोर ने फिर से नाचना शुरू कर दिया. बच्चे खुश, फिर दोनों नटखट ने तालियाँ बजानी शुरू की और वहाँ मौजूद सभी बच्चे भी तालियाँ बजाने लगे.
आगे बढे तो फिर खड़ी चढाई, चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी थी. लोग शरीर को घसीट रहे थे. मजा तो बड़ी तोंद वालों को देख आ रहा था, ऐसे हांफ रहे थे जैसे ओलंपिक से भागते-भागते यहाँ आ गए हों. दार्जिलिंग चिड़ियाघर को देख मैंने सोचा था इतनी चढाई तो किसी चिड़ियाघर में नहीं होगी पर नैनीताल चिडियाघर के आगे दार्जिलिंग चिड़ियाघर तो बहुत ही आसान था. जबकि नैनीताल चिड़ियाघर काफी छोटा है, जो कि मात्र 4.693 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला हैं और दार्जिलिंग चिड़ियाघर का क्षेत्रफल 27.3 हेक्टेयर हैं. पक्षियों की संख्या भी ज्यादा दार्जिलिंग में थी. आगे बढे तो हिमालयन भालू के पास पहुंचे, गर्मी और तीखी धुप से भालू परेशान-परेशान दिख रहा था. वही पास में एक लेपर्ड भी दिख गया. दोनों नन्हे बच्चे इसे कुत्ते और बकरी की श्रेणी का समझ रहे थे, जिसे वो पास जाकर सहला सकें. छोटे कुमार ने कहा किन्ना सुन्दर हैं न पापा, इसे घर ले चलते हैं. और मेरे हंसी फुट पड़ी.
फिर से तीखी खड़ी चढाई, कुछ चीतल, हिरन, बारहसिंगा और कस्तूरीमृग के बाड़े देखते आगे बढे दो रोयल बंगाल टाइगर मिले. एक तो काफी हिंसक लग रहा था, दूसरा जो जाले के अंदर था उस पर थोड़ी-थोड़ी देर में ऐसे गुर्राता और आक्रमक होकर हमला करता कि बस पूछिए मत. पर चुकी दूसरा जाले के अंदर था, तो सुरक्षित था. यहाँ कई सारे उच्च स्थलीय प्राणियों को देखे जा सकते हैं, जो अन्य चिडियाघरों में देखने को नहीं मिलते-जैसे हिमालयी काले भालू, तेंदुए, साइबेरियाई टाइगर, लाल पांडा, प्लम सीवेट बिल्ली, वुल्फ, सिल्वर पैयिएन्ट्स, बंदर, हिल फॉक्स, घुरड, बार्किंग हिरण, सांभर इत्यादि. यहाँ कई सारे लाल पांडा थे, जिसे हमने पहली बार दार्जिलिंग चिड़ियाघर में देखा था. धुप और गर्मी से लाल पांडा पेड़ों के झुरमुटों में बेसुध पड़े थे, तो न तो इसे ठीक से देख ही पाए और न हि फोटो ही ले पाया. मुझे भी लाल पांडा बहुत ही सुन्दर लगते हैं. और फिर से शुरू हुई अंतिम चढाई जो हमें सीधी लेकर गई लेपर्ड्स के पास जो काफी बड़े जंगल जैसे एरिया में थे और एक-दो नहीं कई – कई थे. पर यहाँ भी दोपहर हो जाने के वजह से महाशय सुस्ता रहे थे, पर चार – पांच की संख्या तो दिख ही रही थी. इस अंतिम पड़ाव पर आकार अब चलने की हिम्मत न रही, तो वही बने एक शेड में सुस्ताने बैठ गया. पर बच्चे कहाँ बैठने देते हैं. भूख लग गई मम्मी गाना शुरू हो गया. बैग में बिस्किट के दो छोटे पैकेट थे, जो उन्हें दे दिया गया. इस तरह बच्चों का और हमारा भी चिड़ियाघर घूमने का कार्यक्रम बैंड बजाकर समाप्त हुआ.
हिम्मत तो बची नहीं थी कि जल्दी नीचे चला जाए पर बच्चों के गाने ने पैरों को गति दे दी. वैसे दोपहर हो ही चुकी थी, हमारे पेट में भी चूहें बेकाबू हो उधम मचा रहे थे. गिरते-पड़ते-लुढकते हम फिर से टैक्सी स्टैंड पहुंचे और गाड़ी के लिए फिर से आधे घंटे के इंतजार ने और थका दिया. गाड़ी आई तो फिर से बीच की सीट मिल गई और नीचे चल पड़े. इस बार शायद पेट में कूदते चूहों ने डर खत्म कर दिया था.
नीचे काफी देर तक रिक्शे का इंतजार करते रहे, पर न रिक्शा मिलना था न मिला. चूहें तो जैसे हमें ही खा जाने वाले थे, बच्चों का गाने के साथ डांस भी शुरू होने लगा था. कोई उपाय न देख पैदल ही पंत पार्क चौराहे की ओर चलना शुरू किया, जहाँ से सुबह होकर आए थे. गेस्ट हाउस में खाने को कुछ मिलने वाला था नहीं तो हमें बाहर ही खाना-खाना था. माल रोड पर ही अन्नपूर्णा रेस्टोरेंट (शुद्ध शाकाहारी) में जमकर भोजन किया. माल रोड पर होने की वजह से थोडा महंगा तो था, पर खाना स्वादिस्ट था. दूसरे सस्ते भोजनालय का ठिकाना बाद में भटकने के बाद ही ढूंढा जा पाएगा, माल रोड पर बाकि सभी रेस्टोरेंट इससे भी महंगे हैं, पर शाकाहारी कोई नहीं. खाना खाने के बाद पास ही अपने कैलाश पर्वत पर स्थित गेस्ट हाउस पहुँच हम फिर से मोटे-मोटे रजाई में घुस अजगर और गैंडे की तरह पसर गए.


आगे अगले किस्त में ...

Saturday, 13 July 2019

Naina Devi Temple - श्री माँ नयना देवी (मन्दिर ) दर्शन

तालों का शहर नैनीताल – Lake City Nainital  भाग


दूसरा दिन


नींद खुली तो सुबह के 7 बज रहे थे, माताश्री फ्रेश होकर बैठी थी. अजगर और गैंडे की तरह पड़े रहने वाले मिशन में नैनीताल के मौसम ने भी खूब साथ निभाया, कल दोपहर से आज सुबह तक पड़े-पड़े हमने अजगर और गैंडे को भी मात दे दी. एक पानी की बोतल लेकर बाहर बरामदें में निकला और नीचे आकर एक झूले पर पसर गया. सुबह उठकर 4-5 ग्लास पानी जरूर पीना चाहिए, इसके अनगिनत फायदे हैं.

सुबह उठकर पानी क्यों पीना चाहिए?
· सुबह पानी पीने से, शरीर में मौजूद विषैले पदार्थ निकल जाते हैं. 
· सुबह पानी पीने से, नई कोशिकाओं का निर्माण तेजी से होता है
· सुबह पानी पीने से, मेटाबॉलिज्म तेज हो जाता है.
· सुबह पानी पीने से, पेट साफ रहता है और कब्ज की शिकायत नहीं होती.

पानी की बोतल खाली हो चुकी थी, झूले पर बैठा सुबह की ताजगी के साथ सामने पहाड़ों के पीछे से उदित होते बाल सूर्य को निहारता रहा. सामने पहाड़ों से सूर्यदेव निकल रहे थे और नीचे नैनीताल और झील के आसपास अंधकार छाया था, अद्भुत दृश्य था. सूर्य की रोशनी पड़ने से पहाड़ों के सिर्फ उपरी हिस्से चमक रहे थे. झील के किनारे नयना देवी मन्दिर से लगातार घंटे की आवाज आ रही थी, जो मन को भा रही थी. एक अलग ही आकर्षण था घंटे की आवाज में, काफी देर आँखें बंद किए झूले पर हम्मोहित अवस्था में बैठा रहा. घंटे के नाद पर मन ठहरा रहा. ऐसा लग रहा था जैसे आवाज अंदर से ही आ रही हो. फिर उठकर पार्किंग में टहलता रहा. दोनों कुमार भी जाग चुके थे, पापा-पापा कर दोनों दौड़े आ रहे थे. दोनों की जिद पर फिर से झूले पर आकर जम गया. झूलते-झूलते दोनों कुछ गुनगुना भी रहे थे- झूला झूले नन्दलाल, छोटी-छोटी गैया कभी कुछ और. आज भी ठण्ड लग रही है, अगर फिर बारिस हुई तो गर्म कपडे खरीदने होंगे. हम बच्चों की जैकेट और इनर तो लेकर आए पर सामान ज्यादा न हो इस वजह से अपने गर्म कपडे नहीं रखे. बच्चे झूले से उतरकर पार्किंग में उछल-कूद करते रहे. पार्किंग में खड़ी दो गाड़ी से सामान उतरता देख ये अंदाजा लग रहा है कि कुछ लोग सुबह-सुबह भी आए हैं.

कमरे में आकर फ्रेश होने के बाद आज नयना देवी मन्दिर जाकर माता के दर्शन और आशीष लेने का प्लान बना. बच्चों को हल्का-फुल्का फल और बिस्किट दे दिया गया, हमने दर्शन के बाद ही लंच करने की सोची. नौ बजे टहलते हुए गेस्ट हाउस; जिसका नाम माताश्री ने कैलाश पर्वत रखा था; से नीचे आए. नीचे आते वक्त भी फिर ऊपर कैसे जाएंगे? यही चिंता थी उनको. वैसे ऊपर ज्यादा दूर नहीं, पर चढाई बिलकुल खड़ी है. धुप खिली हुई थी पर ठण्ड थी, बच्चे जैकेट पहने थे. अपने पास कोई स्वेटर था ही नहीं तो ऐसे ही झेल रहे थे. आप भी जब हिल स्टेशन, पहाड़ों पर ऊंचाई पर जाएँ, चाहे गर्मी ही क्यों न हो एक हल्की स्वेटर जरूर रखें. पहाड़ों के मौसम मासूका के मूड की तरह बदलते रहते हैं.

गेस्ट हाउस से नीचे भी बोटिंग पॉइंट थी तो नीचे आते ही बोटिंग वाले पूछने लगे. बच्चे फिर से उछल-कूद मचाने लगे पर हम सबसे पहले माता रानी के दरबार में हाजरी देना चाहते थे. झील के किनारे-किनारे माल रोड के निचले रोड से हम नयना देवी मन्दिर की ओर बढ़ रहे थे. माल रोड मल्लीताल और तल्लीताल को जोड़ती है. आपको ये नाम अजीब लग रहे हों, पर यही नैनीताल की जान है. बस स्टैंड वाला दक्षिणी एरिये को तल्लीताल कहते हैं, तल्ली मतलब नीचे, तो तल्लीताल मतलब नीचे का ताल. उत्तरी किनारे को मल्लीताल, मल्ली मतलब ऊँचा, कहते हैं. नैनी झील की चारों ओर सुंदर वृक्षों से आक्षादित सड़क बनी है, जिसपर वाक करने का आनन्द ही अलग होगा. माल रोड की दुकाने अभी खुल ही रहे थे तो ज्यादा भीडभाड नहीं थी.

माल रोड पर तेजी से आते-जाते रिक्शे मनमोहक लग रहे थे. किसी रिक्शे पर गौरांग सवार दिखते तो किसी पर नव विवाहित जोड़े भडकदार कपड़ों में, जो हनीमून मनाने नैनीताल आए हुए हैं. सूट-बूट पहने लोग रिक्शे पर मजेदार लग रहे थे. आपको बता दूँ, नैनीताल में कोई ओटों, ई-रिक्शा नहीं चलता. मालरोड और आसपास जाने-आने के लिए रिक्शा ही दूसरा साधन हैं और पहला साधन चरणसिंह की 11 नंबर की गाड़ी. नहीं समझे, अरे आपके खुद के चरण, पैर. हा... हा... हा.

बोट हाउस क्लब होते हम पंत पार्क चौराहे पहुंचे, वहाँ लगे बोर्ड को देखकर पता चला कि तिब्बत मार्केट, गुरुद्वारा, नयना देवी मन्दिर, जामा मस्जिद और उड़न खटोला (रोपवे) सब मल्लीताल में ही हैं. चौराहे से मन्दिर की ओर मुड चले, पंत पार्क चौराहे पर एक बोटिंग पॉइंट थी तो बोट वाले बोटिंग के लिए पूछते रहे. बच्चे तो पुरे रास्ते झील में बोट देखकर बेकाबू थे. रास्ते में सुंदर गुरुद्वारे में सीस नवाया और तिब्बत मार्केट होते हुए सीधे मन्दिर.

Naini Devi Mandir
Naina Devi Temple
Naina Devi 
Shivala at Naina Devi Temple
Nandi 
हम गेट के बाहर खड़े थे, मन्दिर के गेट पर श्री माँ नयना देवी मन्दिर लिखा था. बाहर प्रसाद की दुकानों से माताश्री और श्रीमतिजी ने प्रसाद ले लिया. सीढियों से नीचे उतरकर मन्दिर प्रांगन में आकर माँ नयना के दर्शन किये. मन्दिर परिसर ज्यादा बड़ा नहीं और मुख्य मन्दिर भी छोटा ही है. मन्दिर परिसर से दिल को मंत्रमुग्ध करने वाले दृश्यों ने हमें वहाँ काफी समय तक बांधे रखा. बच्चों को मस्ती करने के लिए नैनीझील की बड़ी-बड़ी मछलियाँ मिल गई. दोनों बच्चे माता को चढ़ाये प्रसाद कि मुढ़ी (मुरमुरे/लईया) को ऊपर से नीचे पानी में डालते तो सैकड़ों बड़ी-बड़ी मछलियाँ उसे खाने उमड़ पड़ती. बच्चे काफी देर इसी में लगे रहे, प्रसाद खत्म होता देख मम्मी और दादी ने झिड़की दी तो दोनों आसपास गिरे प्रसाद के दानों को उठाकर मछलियों को चारा डालने लगे. उनके डाले दानें को खाने की होड में मछलियाँ एक जगह जमा हो जाती और दोनों कुमार खूब खुश होते. नैनी झील की मादकता और विस्तार को यहाँ से महसूस कर रहा था. एक घंटा मन्दिर में बिताने के बाद हम फिर से माता एक बार नमन कर  बाहर आ गए.

नयना देवी मन्दिर के बारे में

मां नयना देवी मंदिर जिसे शक्तिपीठ माना जाता है, मान्यताओं के अनुसार, दक्ष पुत्री सती की बांयी आंख नैनीताल के नैनीझील में गिरी. यहाँ दिनभर देशी-विदेशी सैलानी और भक्तों का तांता लगा रहता है. नयना देवी मंदिर में माँ के नयनों की पिंडी रूप में पूजा की जाती है. मंदिर से नैनी झील और नैनीताल का मन को आह्लादित करने वाला प्राकतिक नजारों का आनंद उठाया जा सकता है.

सन 1880 में नैनीताल में आए भयंकर भूस्खलन ने मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था. जैसी जानकारी मिली मां नयना देवी ने नगर के प्रमुख व्यवसायी और श्री मोतीराम साह के पुत्र और धार्मिक प्रवृति के श्री अमरनाथ साह को स्वप्न में उस स्थान का पता बताया जहां उनकी मूर्ति दबी पड़ी थी. अमरनाथ साह ने अपने मित्रों की मदद से काफी मेहनत और परेशानी के बाद देवी की मूर्ति को खुदाई कर निकलवाया और और नए सिरे से मंदिर का निर्माण कार्य भी किया. मंदिर का आज का स्वरुप सन 1883 में बनकर तैयार हुआ और विधिवत पूजा-अर्चना के साथ माँ को स्थापित किया गया.

मंदिर सुबह 6:00 बजे से रात्री 10:00 बजे तक दर्शन और पूजा - अर्चना के लिए खुला रहता है.

एक घंटे मन्दिर में बिताने के बाद हम बाहर आ गए और चौराहे से छोटे से रास्ते से रोपवे की ओर चल पड़े. वहाँ काउंटर पर बताया गया कि अभी टिकेट लेंगे तो दो घंटे बाद का नंबर आएगा. रोपवे के लिए इतनी देर वेट? हमने कौन सा पहली बार रोपवे देखना था तो आज चिड़ियाघर ही देख लेने की सोच चल पड़े. पंत पार्क चौराहे पर आकार रिक्शा वाले को पूछा तो पता चला पहले काउंटर से पर्ची कटवानी पड़ेगी तो ही रिक्शा मिलेगा. रिक्शे का काउंटर पहली ही बार सुन रहा था, तो आश्चर्यचकित तो होना ही था. पास ही काउंटर दिखा, 20 रुपये की पर्ची एक रिक्शे की मल्लीताल रिक्शा स्टैंड से तल्लीताल रिक्शा स्टैंड दो लोगों के लिए. बच्चों को चाहे तो पीछे लटका दें या खुद ही गोद में टांग लें. हमने दो रिक्शे लिए, बच्चे रिक्शे पर चढते ऐसे खुश हो रहे थे जैसे या तो रिक्शा ही पहली बार देखा हो या रिक्शे की जगह फाइटर प्लेन में चढ रहे हों. माल रोड पर रिक्शे की सवारी का भी अपना अलग ही आनन्द आ रहा था, ऐसा आनन्द तो आजतक किसी गाड़ी में बैठकर न आया होगा. यहाँ रिक्शे काफी तेजी से और बिना उठा-पटक के चलते हैं जो मन को आनन्दित कर देते हैं.

हम अपने कैलाश पर्वत को रास्ते में पार करते चिड़ियाघर जाने वाले रास्ते के पास पहुँच गए जो माल रोड पर ही है. यहाँ भी चढाई कैलाश पर्वत जैसा ही था, पता चला चिड़ियाघर ऊपर काफी दूर है. बिना शटल सेवा के जाना मुश्किल है. बाकी गाड़ियों को ऊपर जाने नहीं दे रहे थे. वहाँ गाड़ियों के इंतजार में भीड़ लगी थी. एक लड़के ने आकार पूछा चिड़ियाघर जाना है ? हमारे हाँ करने पर एक पेड़ के नीचे इशारा कर बताया वहाँ से शटल की टिकट लेकर आइये और मुझ से नंबर ले लीजिए. प्रति व्यक्ति आना-जाना 60 रूपये के हिसाब से 240 रूपये देकर चार शटल टिकट लेकर लड़के को टिकट दिखाया, उसने उसपर कुछ नंबर लिखा. एक बोलेरो ऊपर से नीचे आकर रुकी तो मालूम हुआ यही शटल सेवा की गाड़ी है. पहले से लगी भीड़ उसपर टूट पड़ी, तो मुझे अंदाजा लग गया हमें काफी देर इंतजार करना पड़ेगा. वैसे गाड़ी में नंबर के हिसाब से ही बिठा रहे थे, पर कभी सीट कम और आदमी ज्यादा और कभी लड़के ने बताया आज सन्डे है इस वजह से ज्यादा भीड़ है, अब हमने तो टिकट ले लिया था तो सिवा इंतजार करने के कोई रास्ता न था.

हमें कितनी देर इंतजार करना पड़ा? हम चिड़ियाघर देख भी पाए या नहीं?  

आपको बताएँगे अगले भाग में ....

Friday, 5 July 2019

भागलपुर से नैनीताल की यात्रा - Bhagalpur To Lake City Nainital

नैनीताल यात्रा  भाग – २



आखिर गर्मी की छुट्टियों का दिन आ गया, गर्मियों की छुट्टियों मतलब बच्चों के घुमक्कडी का सबसे बेहतरीन समय. सूर्यदेव के कहर से लोग त्राहिमाम कर रहे थे और हम नैनीताल के लिए निकल रहे थे. हम पहले भागलपुर (लूप लाइन पर स्थित) से किउल (कोलकत्ता-दिल्ली मेन लाइन) रात्रि 02:45 बजे फरक्का एक्सप्रेस से पहुंचे, जो लगभग 100 किलोमीटर दूर था. रात्रि की यात्रा थी, इसलिए इसमें भी हमें आरक्षण करवा रखा था. ढाई घंटे इंतजार के बाद किउल से सुबह 05:15 बजे बाघ एक्सप्रेस से, नैनीताल के सुहाने सफर पर निकल पड़े. भागलपुर से नैनीताल की यात्रा 1230 किलोमीटर लंबी थी.


ट्रेन का सफर, घर के बने पराठे-सब्जी, लिट्टी, चुडा-छोले, मिठाई, कुकीज और स्पेशल केक और न जाने क्या-क्या खाते-सोते और ट्रेन की खिडकी से तेजी से भागते दृश्यों को देखते बीता. हाँ, साथ ही छोटे कुमार के कई उलझे-सुलझे सवाल भी थे- “पापा, नैनीताल काली पहाड़ जैसा जितना ऊँचा और बड़ा होगा न? मम्मी तो बहुत सारा सामान ले ली है, हमलोग पहाड़ पर इतना सामान लेकर कैसे चढेंगे?”




चार साल के छोटे कुमार दार्जिलिंग, सिक्किम तो घूम ही चुके, तीन साल की उम्र में दो बार मंदारहिल की लगभग दो किलोमीटर की ट्रेक के साथ राजगीर के पहाड़ी की ट्रेक भी छः साल के बड़े भाई के साथ कर चुके. पर उनकी नजर में नानाजी के शहर जमालपुर की काली पहाड़ सबसे ऊँची है. आपलोगों को फिर कभी जमालपुर के बारे में भी बताऊंगा.

काठगोदाम रेलवे स्टेशन 

काठगोदाम रेलवे स्टेशन के बाहर का दृश्य 


सुबह हल्द्वानी पहुँचने पर अपना सामान समेटा, आधे घंटे लेट होकर ट्रेन 10 बजे काठगोदाम स्टेशन पर खड़ी थी. स्टेशन से बाहर टैक्सी वालों की मनमानी देख लगा, बेहतर होता हल्द्वानी ही उतर जाता. हल्द्वानी स्टेशन से बाहर ही नैनीताल के लिए टैक्सी, शेयर टैक्सी, बस आसानी से मिल जाते हैं. काठगोदाम स्टेशन से मुख्य मार्ग थोड़ी दूर है, अगर बस लेना हो तो सामान लेकर सड़क तक जाना मुसीबत है. खैर, एक टैक्सी ली और चल पड़े अपने सपनों के मंजिल की ओर, काठगोदाम से नैनीताल लगभग 35 किलोमीटर की दुरी पर है. सपनों ने अपने पुरे पंख फैला दिए और सपनों की उड़ान के बीच बच्चों की हंसी-ठिठोली और वादियों का अनुपम सौंदर्य एक अनोखा एहसास दिला रहा था.

पहला पड़ाव था- पकोड़े और चाय की दुकान. पर चाय किसी को पीनी नहीं थी तो सिर्फ गर्मागर्म पकोड़े लेकर चल पड़े. पकोड़ों का स्वाद हमने खूबसूरत वादियों के साथ गाड़ी में ही लिया. दुकान पर देखा था हमारे आगे जाने वाली गाड़ी की महिलाएं नीबूं काटकर उसपर नमक लगाकर चाट रही है, तो पता चल गया आगे पहाड़ों पर होने वाला उबकाई, चक्कर का समय आने वाला है. रास्ते में श्रीमतीजी को थोड़ी उबकाई आई तो हमने गाड़ी को साइड में रुकवाई और थोड़ी देर रूककर नजारों का आनन्द लिया. बच्चों को चाकलेट और हमने हाजमोले का चटकारा ले  लिया, ताकी रास्ते में और उबकाई न आये. जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, गर्मी कम होती जा रही थी और हवा में ठंडक और ताजगी बढती जा रही थी. पुरे रास्ते हमारी नजर गाड़ी की खिडकी के बाहर के नजारों-पहाड़ों-खाइयों को ही देखती रही. मुड़ती सड़क पर जब गहरी खाइयाँ दिखती तो जान हलक में आ जाती, छोटे कुमार जो मेरे साथ आगे की सीट पर जमे थे डर के मारे पीछे की सीट पर भाग लिए और अगली सीट खाली होते ही बड़े कुमार आ जमे थे मेरी गोद में.




वादियों में कुछ घर दिखने लगे थे, हमने अंदाजा लगाया कि हम नैनीताल पहुँच गए. बस स्टैंड से आगे बढते ही नैनी झील दिखने लगी. वाह क्या नजारा था, तीनों ओर से पहाड़ों से घिरा बीच में बेहद खूबसूरत झील. झील में तैरते बोट को देख बच्चों का हर्ष चरम बिंदु पर था और वो तो जैसे गाड़ी से कूद ही पड़ते. सामने दो सुन्दर और साफ-सुथरी सड़क नजर आ रही थी, जो वन-वे थी. मतलब जाने और आने के लिए अलग-अलग सड़क, यही नैनीताल का प्रसिद्द मॉल रोड था, जिसने जाने कितने लेखकों, कवियों और शायरों को अपना दीवाना बनाया. तीनों ओर की पहाड़ियों पर सैकड़ों होटल के साथ ही लोगों के घर भी थे. पैदल चलने के लिए झील के साथ-साथ सुंदर रास्ता बना था. मॉल रोड के निचले रोड पर थोडा आगे जाकर ड्राईवर ने एक जगह गाड़ी रोक दी और सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा किया- “वो सामने रहा आपका गेस्टहाउस”. बोर्ड तो हमें भी दिख रहा था, सो बोरिया-बिस्तर लेकर कूद पड़े.


नैनी झील 

हमें क्या पता था आते ही हमारा एडवेंचर शुरू होने वाला है, हम दोनों सड़क को पार कर बोर्ड वाले जगह पहुंचे तो वो सड़क दूर तक बिलकुल ऊंचाई पर जाती दिख रही थी. ऊपर जाती सीधी सड़क को देख कर ही गला सुख गया. चढ़ना तो था ही चाहे जैसे चढ़े, सीधी सड़क पर सामान के साथ चढ़ते दम निकल गया, हमारे साथ बच्चे भी हांफ रहे थे. गिरते-पड़ते ऊपर पहुँच कर बड़ी सी पार्किंग में खड़ी गाड़ियों को देखा तो अनायास ही ड्राईवर की धूर्तता पर दिमाग उबल पड़ा और ड्राईवर के लिए दो-चार गालियाँ निकल पड़ी. ऊपर पहुँच कर दस मिनट बाद ही जान-में-जान आई, उसी समय एक गाड़ी ऊपर आई, तो फिर ड्राईवर को दो-चार दे डाली.


धूर्त गाड़ी वाला 

हमलोग नैनीताल पहुँचते ही जिस ड्राईवर की चालाकी का शिकार हुए, उस गाड़ी को आप भी देख लो. जब भी नैनीताल जाओ, इस गाड़ी में भूल कर भी मत बैठना. ऐसे लोग ही पर्यटन स्थल का नाम बदनाम करते हैं, जब पैसे पुरे लिए पहुँचाना भी बिलकुल सही जगह पर था.


जब होशो-हवास वापस आया तो गेस्टहाउस की लोकेशन और वहाँ से दिखते शानदार नजारों ने मोहित कर दिया. सामने बड़ी सी पार्किंग, दो मंजिले गेस्टहाउस में उपरी मंजिल की छत लकड़ी की बनी थी, जो बेहद खूबसूरत दिख रही थी. कमरे के सामने नजारों का आनन्द लेने के लिए बरामदा, कुल मिलकर गेस्टहाउस सबको पसंद आया.  सामान एक जगह रख स्वागतकक्ष जाकर अपने आगमन की सूचना दी और औपचारिकता पूरी की, दो लड़कों को रूम की सफाई के लिए साथ भेजा गया. हमारा कमरा दूसरी मंजिल पर था, जो पहले से ही हमारे नाम आरक्षित था. बरामदे से सामने नैनी झील और पहाड़ का बेहतरीन नजारा दिख रहा था.


गेस्ट हाउस 

सफाई के बाद कमरे में सामान जमाया और थोडा आराम करने के बाद स्नान कर आसपास विचरण करने और लंच करने के विचार से निकलने वाले थे कि मेघराज ने गरजना शुरू कर दिया. गेस्टहाउस में ब्रेकफास्ट और डिनर प्री-आर्डर पर ही बनता है, दिन में गेस्ट रहते नहीं तो खाना भी नहीं बनता. हम इंतजार करते रहे कि शायद बारिस रुके और हमें कमरे से निकले पर मेघ गरजते-बरसते रहे. आखिर में अपने पास उपलब्ध खाने-पीने के सामान से ही पेट पूजा की और बरामदे से काफी देर तक बारिस में झील और पहाड़ों की खूबसूरती को निहारता रहा. मैं सिर्फ हाफ टी-शर्ट में था, ठण्ड के मारे कपकपी छुट रही थी. रात के खाने का आर्डर लेने वाले लड़के ने बताया बारिस तीन दिनों से हो रही है, जिसके वजह से ठण्ड काफी बढ़ गई है.


दरबाजे पर दस्तक से नींद खुली, गर्मागर्म डिनर हाजिर था. घडी देखी तो रात के दस बज रहे थे. हमलोग घर में रात्रि का खाना सात बजे तक खा लेते हैं, पर यहाँ इतनी देर हो गई. कल से खाना थोडा पहले देने को बोल पेट में उछलते-कूदते चूहों को शांत किया. कपकपाती ठण्ड में गर्मागर्म तवा रोटी के साथ मटर-पनीर और अरहर दाल का तड़का खाकर जो आनन्द और तृप्ति मिल रही थी, उसे बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. खाना-खाकर बरामदे से मौसम का जायजा लिया, बारिस फिर शुरू हो गई थी.

आखिर और कोई उपाय न देख हम अपने “अजगर और गैंडे की तरह पड़े रहने वाले” मिशन पर लग गए और मोटी-मोटी रजाई में घुसकर लंबे हो गए.

आज नैनीताल में होकर भी नैनीताल न देख पाने का मलाल दिल में लिए, न मालूम कब नींद के अपने आगोस में चले गए.


आप भी सो जाओ, आगे फिर अगली किस्त में.

शुभ रात्रि.    

Thursday, 4 July 2019

तालों का शहर - नैनीताल

नैनीताल यात्रा  भाग – १ 

फरवरी के चिलचिलाते ठण्ड में हमारे घर में चर्चा गर्म थी – गर्मियों की छुट्टियों में कहाँ जाया जाए???
सब अपनी-अपनी राय बड़े उत्साह के साथ पेश कर रहे थे, आखिर मौज-मस्ती तो सबको करनी थी. कभी कन्याकुमारी और रामेश्वरम, तो कभी फिर से सिक्किम, कभी हिमाचल तो कभी ऐसे सी कुछ. अब आप सोच रहे होंगे ये लोग चिलचिलाते ठण्ड में गर्मियों की छुट्टियों की प्लानिंग क्यों कर रहे हैं? असल में हमारे यहाँ ट्रेन सीमित और ट्रेनों में भीड़ अत्यधिक है, तो कभी भी ट्रेन में आरक्षण जब आप चाहेंगे तब मिलेगी नहीं, रेलवे के  चार महीने पहले आरक्षण करवाने की सुविधा भी दुविधा में डालने वाली है. आप भी अपनी प्लानिंग में हमेशा इस बात का ध्यान रखें, नहीं तो सिर्फ हाथ मलने के कुछ न मिलने वाला.



काफी सोच-विचार के बाद प्लान तैयार था तालों का शहर- नैनीताल का. डेस्टिनेशन हमें मिल चूका था, ट्रेन में आरक्षण की स्थिति और होटल के सर्वे करने में दो-तीन दिन निकल गए. हमारे यहाँ से सीधी ट्रेन की सुविधा थी नहीं. हमें पहली ट्रेन से भागलपुर से किउल और फिर दूसरी ट्रेन बदल कर काठगोदाम पहुंचना था, वहाँ से सड़क मार्ग से नैनीताल.

ट्रेन की स्थिति ऐसी थी कि मई की यात्रा के लिए फरवरी में ही वेटिंग. हमें चार सीट चाहिए थी, पर जून की पहली सप्ताह तक वेटिंग देखते-देखते कई बार मन में विचार आया कि प्लान कैंसिल कर दूँ, क्योंकि बच्चों के स्कूल से मार्च के अंत में डायरी मिलेगी जिसमें छुट्टियों का व्योरा होगा और तब तक सीटें रिग्रेट हो जाने वाली थी. फिर मैंने तुक्के में पिछले वर्ष जिस तिथि को बच्चों की छुट्टी हुई थी, उसी तिथि को आरक्षण करवा लिया. संयोग से यही एक तिथि थी, जब सीट उपलब्ध थी. अब जब तक बच्चों को स्कूल से नए सत्र की डायरी नहीं मिल जाती तब तक गहरा सुस्पेंस और थ्रिल बन गया.

होटल हमेशा अपनी डेस्टिनेशन पहुंचकर ही लेता रहा हूँ, पर पिछली गर्मियों में दार्जिलिंग और गंगटोक में होटलों ने जरूरत से ज्यादा ही जेबें काटी, तो इस बार फिर जेब न कट जाए पहले से सचेत था. कई सारे विकल्प कैम्प स्टे, भीमताल, भवाली और आसपास का विकल्प देख रहा था, जहाँ होटल सस्ते थे. खुशकिस्मती से नैनीताल में हमारे नियोक्ता का आलीशान गेस्टहाउस का पता चला, तो उसमें ही नियत समय में बुकिंग कर ली. पर वो भी आसान न था, सारी प्रोसेस ऑफलाइन और पुराने तौर-तरीके से हुई तो दो महीने लग गए ये बता चलने में कि हमें कमरा मिल भी रहा है या नहीं. खैर, अंत भला तो सब भला.

बच्चों की स्कूल डायरी मार्च के अंत में मिल चुकी थी और बस ये समझ लो उपरवाले ने लाज रख ली. जिस दिन रात को ट्रेन थी, वही स्कूल का आखरी दिन था और अगले दिन से गर्मियों की छुटियाँ शुरू हो रही थी. बाल-बाल बचे. यह यात्रा मैंने अलग तरीके से प्लान की थी. हर यात्रा में खूब भागा-भागी होती है, पर नैनीताल में हम सिर्फ खाकर अजगर और गैंडे की तरह पड़े रहने वाले थे, मतलब नैनीताल में – मस्ती और सुस्ती के पांच दिन.



बने रहिए, आपको बताएँगे, हमने पांच दिन अजगर और गैंडे की तरह कैसे बिताए.

Wednesday, 30 January 2019

दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 10

अंतिम किस्त 


दिनांक 01.06.2018
12:30 बजे हमलोगों ने होटल से चेक आउट किया और दो लोकल टैक्सी से गंगटोक टैक्सी स्टैंड पहुँचे, यहाँ हमें न्यू जलपाईगुडी के लिए टैक्सी काउन्टर से 3500 रूपये की बोलेरो मिल गई, गंगटोक से न्यू जलपाईगुडी के लिए बस भी आसानी से मिल जाती है, पर हमें 8-9 सीटों की जरूरत थी और एक घंटे बाद जाने वाली बस में इतनी सीट उपलब्ध नहीं थी. उसके लिए हमें कम से कम दो-ढाई घंटे बैठना पड़ता. वैसे हमें गाडी बुक करने के बाद भी आधे घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ा. हमें जो बोलेरो मिली वो बस अभी-अभी दार्जिलिंग से आई थी. सारा सामान ऊपर डालकर उसे ढककर बँधवाया, क्योकिं आते वक्त मैंने ध्यान नहीं दिया था और ड्राईवर महोदय ने ठीक से ढका नहीं था, जिसकी वजह से हमारा सामान थोड़ा गीला हो गया था. हम अपने यात्रा को समाप्त कर वापसी पर थे, लगभग 1:30 मिनट पर हमलोगों ने गंगटोक को अलविदा कहा और न्यू जलपाईगुडी की ओर चल पड़े. गंगटोक को ठीक से न देख पाने  का मलाल दिल में लिए, फिर आने का वादा खुद से करता मैं गुमसुम सा बैठा था. सिक्किम में टूरिस्ट स्पॉट की कोई कमी नहीं, जिसके लिए दुबारा तो आना ही पड़ेगा. काफी समय बाद मुझे पता चला कि अरे सब से सब चुपचाप हैं. ऐसा हमेशा होता है- जब हम यात्रा से वापसी करते हैं तो थोड़ी उदासी तो होती ही है. रास्ते में ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच से जाता रास्ता मनमोहक और अदभुत था.

एक जगह खाने की स्टोपेज के बाद हम लगभग 6 बजे न्यू जलपाईगुडी पहुँचने वाले थे कि मॉनसून न आहट दी, जिसकी वजह से मूसलाधार बारिस शुरू हो गई. स्टेशन के बाहर पानी लबालब भर चुका था और हमें भी बारिस में भींगते हुए समान लेकर उतरना पड़ा.

हमारी ट्रेन रात्रि 10:45 बजे थी, ट्रेन आने के पहले हमने स्टेशन पर ही बने फ़ूड प्लाजा में खाना खाया. खाना ठीक ही था और साफ-सफाई का कोई जवाब ही नहीं. ट्रेन आधे घंटे लेट आई. हम सब ट्रेन में सवार हो गए, पता चला ट्रेन में काफी वेटिंग चल रही है. हमारे सीट पर भी कई जवान बैठे थे, जिन्होंने एक बार ही बोलने के बाद सीट हमें सौप दी. हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं था कि हम सीट शेयर कर सकते. एक तो रात्रि का समय और दुसरा हमारी सारी सीट उपर की थी. खैर, जवानों ने इधर-उधर किसी तरह एडजस्ट किया, पर सच पूछिए तो दिल से बहुत ही बुरा लग रहा था. पर हमारे साथ भी छोटे चार-चार बच्चे थे तो कोई रास्ता भी न था. हमारे भागलपुर होकर जाने वाली ब्रह्मपुत्र मेल में जवानों को आते-जाते बचपन से देखता रहा हूँ. काफी देर तक दिल भारी-भारी सा रहा, पर खुद को लाचार महसूस करता रहा. छोटे राजकुमार को लेकर साइड अपर सीट पर एडजस्ट भी नहीं कर पा रहा था. काफी देर तक करवट बदलता रहा और कब नींद आ गई पता ही नहीं चला.

नींद खुली तो ट्रेन की स्टेट्स देखा, ट्रेन डेढ़ घंटे ही लेट चल रही थी और एक घंटे में हम अपने गंतव्य स्टेशन पर पहुँच जाने वाले थे. ब्रह्मपुत्र मेल के लिए डेढ़ घंटे लेट होना कोई बड़ी बात नहीं थी, ये ट्रेन अपने लेट-लतीफी के लिये बदनाम है. बरसात में तो यह असम की बाढ़ की वजह से 24 घंटे से भी ज्यादा लेट चलती है. साइड अपर सीट पर रात छोटे बेटे के साथ किसी तरह गुजरी, शरीर अकड सा गया एक ही साइड करवट लेटे-लेटे. नीचे उतर कर शरीर सीधा किया और सबको जगाया. थोड़ी देर में हम भागलपुर स्टेशन पर थे, ट्रेन मात्र एक घंटे लेट थी. इस तरह हमारा दार्जिलिंग और सिक्किम का सफर यादों के झरोखों में एक शिलालेख की तरह अंकित हो गया. हम ऑटो से अपने घरोंदे की और बढ़ रहे थे और मनवा बेपरवाह अभी भी दार्जिलिंग और सिक्किम की वादियों में ही स्वछंद उड़ान भर रहा था.

आपलोगों का आभार, मेरी इस यात्रा में मानसिक रूप से साथ रहने के लिए. अगली यात्रा तक के लिए स्वस्थ रहिये, मस्त रहिये और यायावर मन को यायावरी कराते रहिये.


इस यात्रा में लिये गए कुछ चुनिन्दा फोटो →






















इसे भी पढ़े:

पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 1
भागलपुर से दार्जिलिंग यात्रा

पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 2
पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग की सैर

पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 3
दार्जिलिंग हेरिटेज वॉक

पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 4
दार्जिलिंग से सिक्किम की यात्रा

पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 5
छंगू झील (Tsomgo Lake) और बाबा हरभजन सिंह मन्दिर

पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 6
एक रहस्यमयी मन्दिर की यात्रा

पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 7
रहस्यमयी "बाबा मन्दिर" का रहस्य

पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 8
सिक्किम में बर्फ के भैंस की सवारी

पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 9
गंगटोक का वो रूप जो आपने न देखा होगा

दार्जिलिंग कैसे पहुँचे (How to reach Darjeeling)

सिक्किम कैसे पहुँचे (How to reach Gangtok, Sikkim)
सिक्किम: मन मोहते बर्फीले पर्वत

विक्रमशिला विश्वविद्यालय के भग्नावशेष की सैर

Tuesday, 22 January 2019

गंगटोक का वो रूप जो आपने न देखा होगा

दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा (2018) - भाग 9




दिनांक 01.06.2018

आज यात्रा का अंतिम दिन है और आज ही हम 11 बजे न्यू जलपाईगुड़ी के लिये निकलेगें, जहाँ से हमारी वापसी की ट्रेन है. तो तब-तक सबने आराम फ़रमाने का निर्णय लिया. पर ये मेरी फितरत में नहीं कि मैं यात्रा में समय बिस्तर पर बिता दूँ. तो चलिये आपको भी बताता हूँ आज मैंने क्या किया.

सुबह-सुबह मॉल रोड़ गंगटोक पर पसरा सन्नाटा 

सुबह लगभग 6 बजे उठकर फ्रेश हो गया और 6:40 पर कैप और अपने यात्रा के बेहतरीन साथी मोबाइल को लेकर निकाल पड़ा सुबह-सुबह के सैर के बहाने गंगटोक का बिल्कुल ताजा और खूबसूरती भरा वो चेहरा देखने जो यहाँ आने वाले सैलानियों को भी शायद ही नसीब हो. होटल के सामने ही बिल्कुल शांत और खामोश माल रोड़ था, जहाँ शामें इतनी रंगीन और चमक-दमक मदहोस करने वाली होती है कि आगंतुक को अपने माया जाल में जकड ही लेती है. अनायास तो विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं गंगटोक के माल रोड़ पर हूँ. पर यही तो जीवन का सत्य भी है –
“हर चमन को मुरझाना है, हर महफ़िल को वीरान हो जाना है.”


इधर-उधर कुछ देर चक्कर लगाया, पर माल रोड़ की वीरानी और शांत चेहरा मन को विचलित करने लगा तो गूगल बाबा का सहारा लिया और आसपास नजर डाला. एक पॉइंट पर जाकर नजर अटक गई- “सुइसाइड पॉइंट”. नाम ही कुछ अटपटा सा लगा तो जिज्ञासा बलबती हो गई और कदम चल पड़े महज दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुइसाइड पॉइंट की ओर. आपमें से भी कई लोग सिक्किम गए होंगे पर ये जगह शायद ही किसी ने देखी होगी.


Gangtok Ropeway.... 

सुइसाइड पॉइंट तक पहुँचते, मैंने रास्ते में फैली शान्ति और सैलानियों से अटे-पड़े शहर की खामोसी के साथ सुबह के वो नजारों के दर्शन भी किये जो दिन में नसीब नहीं. सड़क किनारे लगे फूलों की क्यारियों पर ओस की बूंदें, असमान में अटखेलियाँ कतरते शायद वही कल के बादल.


Suicide Point, Gangtok से सूर्योदय का अदभुत नजारा 


सुइसाइड पॉइंट के पहले मुझे गंगटोक रोपवे मिला, यहाँ दिन में भीड़ उमड़ी पड़ी रहती है पर अभी तो मेरे सिवा वहाँ कोई नहीं था और गेट पर ताला लटक रहा था. वहाँ से थोड़ा आगे बढ़ा और सुइसाइड पॉइंट की ओर जाते पतले से रास्ते से पहाड़ी की ओर ऊपर चल पड़ा. इन रास्तों से दिखने वाले दिलकश नजारों ने सुबह-सुबह मुझे तरोताजा कर दिया. वाह, क्या नजारा दिख रहा था वादियों और शहर का. मैं धीरे-धीरे ऊपर की चला गया, मजे की बात ये थी मुझे एक भी इंसान के दर्शन न हुए सुइसाइड पॉइंट के एंट्री पॉइंट से ऊपर तक. असमंजस में था कि ऊपर जाऊं या नहीं क्योंकि जैसे-जैसे ऊपर जा रहा था रास्ते टूटे-फूटे मिल रहे थे और पहाड़ी के बिल्कुल किनारे-किनारे होने की वजह से थोड़ा डर तो लग ही रहा था, क्योकिं दूसरी ओर गहरी खाई थी. खैर, मैं बिल्कुल ऊपर पहुँच गया और यहाँ तो रास्ता ही बन्द था. अब क्या करूँ? क्या वापस इसी रास्ते से जाना पड़ेगा? असमंजस में पड़ गया.

Suicide Point पर मैं अकेला 


Suicide Point से दिखता नीचे वादियों का दृश्य 

Suicide Point से दिखता नजारा 

Suicide Point को ऊपर जाता रास्ता 
किसी तरह इधर-उधर से डग-मग करते ऊपर चढ़ ही गया, यह सोचकर कि जब वापस जाने के पहले कोशिश कर देखता हूँ, शायद निकले का रास्ता मिल जाए. ऊपर शायद किसी बड़े बिल्डिंग का कम चल रहा था. गूगल बाबा झट से हाजिर हुए और बताया कि मैं "खान, खनिज एवं भूविज्ञान विभाग, सिक्किम" के बिल्डिंग में घुस चुका हूँ और वो भी पहाड़ी रास्ते से और साथ में ही सिक्किम विधान सभा भी है. मेरी तो हालत पतली हो गई, थोड़ा डरा भी, क्योकिं ये हाई प्रोफाइल एरिया है और मैं पहाड़ी रास्ते से इसमें घुस गया. 


गंगटोक विधानसभा

Tashi Namgyal Academy के ऊपर से भानु पथ 

फिर हिम्मत कर आगे बढ़ने लगा. बिल्डिंग के काम कि वजह से बड़े-बड़े ट्रक आ और जा रहे थे. मेन गेट खुला था कई सुरक्षा कर्मी भी वहाँ मौजूद थे, पर मैं चुपचाप चलता हुआ गेट से बाहर हो गया और किसी ने मुझे रोका-टोका भी नहीं. सच पूछिए तो गेट के पास पहुँच दिल धक्-धक् कर रहा था, और अगर पकड़ा जाता तो न मेरे पास पर्स था और न ही कोई आईडी कार्ड. खैर, गेट के बाहर आकार जान में जान आई और सिक्किम विधान सभा होते हुए भानु पथ की ओर तेजी से निकाल लिया. भानु पार्क और Tashi Namgyal Academy भी देखने का मौका मिला, पहाड़ी के नीचे Tashi Namgyal Academy का प्ले ग्राउंड काफी खूबसूरत दिख रहा था.
Tashi Namgyal Academy Football Ground

ये वही प्ले ग्राउंड हैं, जहाँ भारतीय फुटबॉलर बाइचुंग भूटिया ने सालों तक फुटबाल के साथ कलाबाजियाँ की हैं. सैकड़ों बच्चे वहाँ फुटबाल की प्रक्टिस कर रहे थे. वहाँ से मुख्यमंत्री आवास होते हुए अब होटल की ओर लौटा. लगभग 6-7 किलोमीटर की सुबह की सैर के साथ गंगटोक का नई-नवेली दुल्हन सा खिला चेहरा देख मन प्रफुल्लित हो रहा था. अब आज का दिन खराब होने का कोई मलाल भी न रहा और खुशी इस बात की थी जो दुर्लभ रूप-रंग मैंने सुबह-सुबह देखा गंगटोक का ये किसी भी पर्यटक ने न देखा होगा.


आगे जारी ...

गंगटोक में सुबह की सैर पर लिये गए चंद फोटो →


सड़क किनारे फूलों की बाहर 


अद्भुत दृश्य ... पर देखने वाला मैं अकेला













इसे भी पढ़े:


Featured post

दार्जिलिंग कैसे पहुँचे (How to reach Darjeeling)

'दार्जिलिंग' शब्द तिब्बती भाषा के दो शब्द ' दोर्जे ' और ' लिंग ' से मिलकर बना है. ' दोर्जे ' का अर्थ ह...