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Wednesday, 30 January 2019

दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 10

अंतिम किस्त 


दिनांक 01.06.2018
12:30 बजे हमलोगों ने होटल से चेक आउट किया और दो लोकल टैक्सी से गंगटोक टैक्सी स्टैंड पहुँचे, यहाँ हमें न्यू जलपाईगुडी के लिए टैक्सी काउन्टर से 3500 रूपये की बोलेरो मिल गई, गंगटोक से न्यू जलपाईगुडी के लिए बस भी आसानी से मिल जाती है, पर हमें 8-9 सीटों की जरूरत थी और एक घंटे बाद जाने वाली बस में इतनी सीट उपलब्ध नहीं थी. उसके लिए हमें कम से कम दो-ढाई घंटे बैठना पड़ता. वैसे हमें गाडी बुक करने के बाद भी आधे घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ा. हमें जो बोलेरो मिली वो बस अभी-अभी दार्जिलिंग से आई थी. सारा सामान ऊपर डालकर उसे ढककर बँधवाया, क्योकिं आते वक्त मैंने ध्यान नहीं दिया था और ड्राईवर महोदय ने ठीक से ढका नहीं था, जिसकी वजह से हमारा सामान थोड़ा गीला हो गया था. हम अपने यात्रा को समाप्त कर वापसी पर थे, लगभग 1:30 मिनट पर हमलोगों ने गंगटोक को अलविदा कहा और न्यू जलपाईगुडी की ओर चल पड़े. गंगटोक को ठीक से न देख पाने  का मलाल दिल में लिए, फिर आने का वादा खुद से करता मैं गुमसुम सा बैठा था. सिक्किम में टूरिस्ट स्पॉट की कोई कमी नहीं, जिसके लिए दुबारा तो आना ही पड़ेगा. काफी समय बाद मुझे पता चला कि अरे सब से सब चुपचाप हैं. ऐसा हमेशा होता है- जब हम यात्रा से वापसी करते हैं तो थोड़ी उदासी तो होती ही है. रास्ते में ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच से जाता रास्ता मनमोहक और अदभुत था.

एक जगह खाने की स्टोपेज के बाद हम लगभग 6 बजे न्यू जलपाईगुडी पहुँचने वाले थे कि मॉनसून न आहट दी, जिसकी वजह से मूसलाधार बारिस शुरू हो गई. स्टेशन के बाहर पानी लबालब भर चुका था और हमें भी बारिस में भींगते हुए समान लेकर उतरना पड़ा.

हमारी ट्रेन रात्रि 10:45 बजे थी, ट्रेन आने के पहले हमने स्टेशन पर ही बने फ़ूड प्लाजा में खाना खाया. खाना ठीक ही था और साफ-सफाई का कोई जवाब ही नहीं. ट्रेन आधे घंटे लेट आई. हम सब ट्रेन में सवार हो गए, पता चला ट्रेन में काफी वेटिंग चल रही है. हमारे सीट पर भी कई जवान बैठे थे, जिन्होंने एक बार ही बोलने के बाद सीट हमें सौप दी. हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं था कि हम सीट शेयर कर सकते. एक तो रात्रि का समय और दुसरा हमारी सारी सीट उपर की थी. खैर, जवानों ने इधर-उधर किसी तरह एडजस्ट किया, पर सच पूछिए तो दिल से बहुत ही बुरा लग रहा था. पर हमारे साथ भी छोटे चार-चार बच्चे थे तो कोई रास्ता भी न था. हमारे भागलपुर होकर जाने वाली ब्रह्मपुत्र मेल में जवानों को आते-जाते बचपन से देखता रहा हूँ. काफी देर तक दिल भारी-भारी सा रहा, पर खुद को लाचार महसूस करता रहा. छोटे राजकुमार को लेकर साइड अपर सीट पर एडजस्ट भी नहीं कर पा रहा था. काफी देर तक करवट बदलता रहा और कब नींद आ गई पता ही नहीं चला.

नींद खुली तो ट्रेन की स्टेट्स देखा, ट्रेन डेढ़ घंटे ही लेट चल रही थी और एक घंटे में हम अपने गंतव्य स्टेशन पर पहुँच जाने वाले थे. ब्रह्मपुत्र मेल के लिए डेढ़ घंटे लेट होना कोई बड़ी बात नहीं थी, ये ट्रेन अपने लेट-लतीफी के लिये बदनाम है. बरसात में तो यह असम की बाढ़ की वजह से 24 घंटे से भी ज्यादा लेट चलती है. साइड अपर सीट पर रात छोटे बेटे के साथ किसी तरह गुजरी, शरीर अकड सा गया एक ही साइड करवट लेटे-लेटे. नीचे उतर कर शरीर सीधा किया और सबको जगाया. थोड़ी देर में हम भागलपुर स्टेशन पर थे, ट्रेन मात्र एक घंटे लेट थी. इस तरह हमारा दार्जिलिंग और सिक्किम का सफर यादों के झरोखों में एक शिलालेख की तरह अंकित हो गया. हम ऑटो से अपने घरोंदे की और बढ़ रहे थे और मनवा बेपरवाह अभी भी दार्जिलिंग और सिक्किम की वादियों में ही स्वछंद उड़ान भर रहा था.

आपलोगों का आभार, मेरी इस यात्रा में मानसिक रूप से साथ रहने के लिए. अगली यात्रा तक के लिए स्वस्थ रहिये, मस्त रहिये और यायावर मन को यायावरी कराते रहिये.


इस यात्रा में लिये गए कुछ चुनिन्दा फोटो →






















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Tuesday, 22 January 2019

गंगटोक का वो रूप जो आपने न देखा होगा

दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा (2018) - भाग 9




दिनांक 01.06.2018

आज यात्रा का अंतिम दिन है और आज ही हम 11 बजे न्यू जलपाईगुड़ी के लिये निकलेगें, जहाँ से हमारी वापसी की ट्रेन है. तो तब-तक सबने आराम फ़रमाने का निर्णय लिया. पर ये मेरी फितरत में नहीं कि मैं यात्रा में समय बिस्तर पर बिता दूँ. तो चलिये आपको भी बताता हूँ आज मैंने क्या किया.

सुबह-सुबह मॉल रोड़ गंगटोक पर पसरा सन्नाटा 

सुबह लगभग 6 बजे उठकर फ्रेश हो गया और 6:40 पर कैप और अपने यात्रा के बेहतरीन साथी मोबाइल को लेकर निकाल पड़ा सुबह-सुबह के सैर के बहाने गंगटोक का बिल्कुल ताजा और खूबसूरती भरा वो चेहरा देखने जो यहाँ आने वाले सैलानियों को भी शायद ही नसीब हो. होटल के सामने ही बिल्कुल शांत और खामोश माल रोड़ था, जहाँ शामें इतनी रंगीन और चमक-दमक मदहोस करने वाली होती है कि आगंतुक को अपने माया जाल में जकड ही लेती है. अनायास तो विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं गंगटोक के माल रोड़ पर हूँ. पर यही तो जीवन का सत्य भी है –
“हर चमन को मुरझाना है, हर महफ़िल को वीरान हो जाना है.”


इधर-उधर कुछ देर चक्कर लगाया, पर माल रोड़ की वीरानी और शांत चेहरा मन को विचलित करने लगा तो गूगल बाबा का सहारा लिया और आसपास नजर डाला. एक पॉइंट पर जाकर नजर अटक गई- “सुइसाइड पॉइंट”. नाम ही कुछ अटपटा सा लगा तो जिज्ञासा बलबती हो गई और कदम चल पड़े महज दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुइसाइड पॉइंट की ओर. आपमें से भी कई लोग सिक्किम गए होंगे पर ये जगह शायद ही किसी ने देखी होगी.


Gangtok Ropeway.... 

सुइसाइड पॉइंट तक पहुँचते, मैंने रास्ते में फैली शान्ति और सैलानियों से अटे-पड़े शहर की खामोसी के साथ सुबह के वो नजारों के दर्शन भी किये जो दिन में नसीब नहीं. सड़क किनारे लगे फूलों की क्यारियों पर ओस की बूंदें, असमान में अटखेलियाँ कतरते शायद वही कल के बादल.


Suicide Point, Gangtok से सूर्योदय का अदभुत नजारा 


सुइसाइड पॉइंट के पहले मुझे गंगटोक रोपवे मिला, यहाँ दिन में भीड़ उमड़ी पड़ी रहती है पर अभी तो मेरे सिवा वहाँ कोई नहीं था और गेट पर ताला लटक रहा था. वहाँ से थोड़ा आगे बढ़ा और सुइसाइड पॉइंट की ओर जाते पतले से रास्ते से पहाड़ी की ओर ऊपर चल पड़ा. इन रास्तों से दिखने वाले दिलकश नजारों ने सुबह-सुबह मुझे तरोताजा कर दिया. वाह, क्या नजारा दिख रहा था वादियों और शहर का. मैं धीरे-धीरे ऊपर की चला गया, मजे की बात ये थी मुझे एक भी इंसान के दर्शन न हुए सुइसाइड पॉइंट के एंट्री पॉइंट से ऊपर तक. असमंजस में था कि ऊपर जाऊं या नहीं क्योंकि जैसे-जैसे ऊपर जा रहा था रास्ते टूटे-फूटे मिल रहे थे और पहाड़ी के बिल्कुल किनारे-किनारे होने की वजह से थोड़ा डर तो लग ही रहा था, क्योकिं दूसरी ओर गहरी खाई थी. खैर, मैं बिल्कुल ऊपर पहुँच गया और यहाँ तो रास्ता ही बन्द था. अब क्या करूँ? क्या वापस इसी रास्ते से जाना पड़ेगा? असमंजस में पड़ गया.

Suicide Point पर मैं अकेला 


Suicide Point से दिखता नीचे वादियों का दृश्य 

Suicide Point से दिखता नजारा 

Suicide Point को ऊपर जाता रास्ता 
किसी तरह इधर-उधर से डग-मग करते ऊपर चढ़ ही गया, यह सोचकर कि जब वापस जाने के पहले कोशिश कर देखता हूँ, शायद निकले का रास्ता मिल जाए. ऊपर शायद किसी बड़े बिल्डिंग का कम चल रहा था. गूगल बाबा झट से हाजिर हुए और बताया कि मैं "खान, खनिज एवं भूविज्ञान विभाग, सिक्किम" के बिल्डिंग में घुस चुका हूँ और वो भी पहाड़ी रास्ते से और साथ में ही सिक्किम विधान सभा भी है. मेरी तो हालत पतली हो गई, थोड़ा डरा भी, क्योकिं ये हाई प्रोफाइल एरिया है और मैं पहाड़ी रास्ते से इसमें घुस गया. 


गंगटोक विधानसभा

Tashi Namgyal Academy के ऊपर से भानु पथ 

फिर हिम्मत कर आगे बढ़ने लगा. बिल्डिंग के काम कि वजह से बड़े-बड़े ट्रक आ और जा रहे थे. मेन गेट खुला था कई सुरक्षा कर्मी भी वहाँ मौजूद थे, पर मैं चुपचाप चलता हुआ गेट से बाहर हो गया और किसी ने मुझे रोका-टोका भी नहीं. सच पूछिए तो गेट के पास पहुँच दिल धक्-धक् कर रहा था, और अगर पकड़ा जाता तो न मेरे पास पर्स था और न ही कोई आईडी कार्ड. खैर, गेट के बाहर आकार जान में जान आई और सिक्किम विधान सभा होते हुए भानु पथ की ओर तेजी से निकाल लिया. भानु पार्क और Tashi Namgyal Academy भी देखने का मौका मिला, पहाड़ी के नीचे Tashi Namgyal Academy का प्ले ग्राउंड काफी खूबसूरत दिख रहा था.
Tashi Namgyal Academy Football Ground

ये वही प्ले ग्राउंड हैं, जहाँ भारतीय फुटबॉलर बाइचुंग भूटिया ने सालों तक फुटबाल के साथ कलाबाजियाँ की हैं. सैकड़ों बच्चे वहाँ फुटबाल की प्रक्टिस कर रहे थे. वहाँ से मुख्यमंत्री आवास होते हुए अब होटल की ओर लौटा. लगभग 6-7 किलोमीटर की सुबह की सैर के साथ गंगटोक का नई-नवेली दुल्हन सा खिला चेहरा देख मन प्रफुल्लित हो रहा था. अब आज का दिन खराब होने का कोई मलाल भी न रहा और खुशी इस बात की थी जो दुर्लभ रूप-रंग मैंने सुबह-सुबह देखा गंगटोक का ये किसी भी पर्यटक ने न देखा होगा.


आगे जारी ...

गंगटोक में सुबह की सैर पर लिये गए चंद फोटो →


सड़क किनारे फूलों की बाहर 


अद्भुत दृश्य ... पर देखने वाला मैं अकेला













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Wednesday, 16 January 2019

सिक्किम में बर्फ के भैंस की सवारी

दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा (2018) - भाग 8



हमारी यह परिवार अन्य लोगों के साथ की गई यात्रा, एक यादगार यात्रा थी. इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ, नीचे इस यात्रा से जुड़ी सभी लिंक भी दे रहा हूँ ताकि आपको इसे ढूंढने में परेशानी न हो.


दिनांक 31.05.2018
दिन के 3:15 बज रहे थे और हमारी गाड़ी बाबा मन्दिर से वापसी कर रही थी. मौसम के बदलते तेवर और ऊँची-ऊँची पर्वतों और वादियों के नैसर्गिक खूबसूरती ने, कैफेटेरिया में पढ़े-लिखे जाहिल जानवरों की वजह से गरम हुए दिमाग को जाने कब का ठंडा कर दिया. अगर आप असमंजस में हैं कि आखिर मैंने ऐसा क्यों कहा तो इस कड़ी को पढ़ें, ताकी आपको मेरी पूरी बात समझ आ पाए. हमें उसी रास्ते से गंगटोक, माल रोड़ वापस जाना था जिस रास्ते से हम आए थे.

छंगू झील (Tsomgo Lake) के पास अदभुत दृश्य 


हमारी गाड़ी हंगू झील (Hangu Lake) से आगे निकली ही थी कि मौसम डरावना होने लगा, बादलों और धुंध ने अब रास्तों को भी घेरना शुरू कर दिया. विजिबिलिटी बिल्कुल कम हो गई जिसकी वजह से आठ-दस फीट के आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. अन्दर से डर भी लग रहा था, सच बोलूं तो फटी पड़ी थी. एक तो गहरे बादलों और धुंध की अटखेलीयाँ, ऊँचें पहाड़ों के सर्पीले रास्ते और ऊपर से हमारे ड्राईवर महोदय की स्पीड वैसे ही तेज, जैसे आते वक्त थी. मैंने ड्राईवर महोदय को एक-दो बार विजिबिलिटी बिल्कुल कम होने की वजह से थोड़ा धीरे गाड़ी चलाने को कहा भी पर वो महोदय अपने ही धुन में मस्त बस लापरवाही से इतना कह देते आप चिन्ता मत करिए, ये सब हम रोज देखते हैं आपको बिल्कुल सही-सलामत आपके होटल छोड़ेंगे. जब भी गाड़ी शार्प कट लेती तेज गति से मुडती और आगे कुछ दिखाई नहीं देता तो डर के मारे जान हलक में आ जाती और गाड़ी को जोर से पकड़ लेता.


कभी-कभी तो मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि प्रकृति के ऐसे रूप को देख एडवेंचर महसूस करूँ या हावी होते डर को सत्य समझूँ या प्रकृति ने जो हमें अपने आगोस में लेकर अपने अलौकिक रूप के दर्शन कराये उसके लिए धन्यवाद करूँ. हमारे बच्चे हम से कहीं ज्यादा मस्ती में एक-एक पल को जी रहे थी, गाड़ी जब किसी बादलों के बड़े समुन्दर को चीरती हुई आगे बढती तो चारों नटखट मिलकर इतने खुश होकर मस्ती में तालियाँ बजाते, नाचते और चीखते कि हमारा डर भी दूर हो जाता. ये नन्हें नादानों को डर छु भी नहीं पा रहे थे. यही गुण अगर हम इन बच्चों से ग्रहण कर ले तो जिन्दगी को देखने का हमारा नजरिया ही बदल जाए और हम जिन्दगी को सही मायने में जी पाएं. हम डरे-सहमें और प्रकृति के अजीबो-गरीब रूप-रंग देख हतप्रद, कई बार तो ऐसा लगा हमने अपनी प्रकृति को इसके रूप-रंग को, इसके लावण्यता को पहली ही बार देखा या यूं कहें हमने आज से पहले कुछ देखा-जाना ही नहीं और जिन्दगी यूं  ही बेकार बीत गई. ऐसे ही आश्चर्यजनक रूप देख अचंभित से हम छंगू झील (Tsomgo Lake) पहुँचे.

छंगू झील (Tsomgo Lake)

बच्चों ने छंगू झील (Tsomgo Lake) से गुजरते वक्त याक देखा था, तो सबको याक की सवारी करनी थी. कुछ ही पलों में 4 बजने वाले थे तो हमने “बर्फ के भैंस” की सवारी न कर सिर्फ बच्चों को ही सवारी कराने का तय किया. याक को “बर्फ के भैंस” के नाम से संबोधित करने से श्रीमतिजी की भौहें तन गई, समझ गया श्रीमतिजी को भी “बर्फ के भैंस” पर सवारी करने का मन हो शायद. थोड़ी देर बाद श्रीमतिजी ने कहा ठीक ही कहा आपने – जब यहाँ के लोग हमारे यहाँ घूमने आयें तो उनको भैंस पर बिठाना चाहिए और सबके ठहाके से छंगू झील का शांत वातावरण गुंजायमान हो उठा, और इस तरह यहाँ हमने  को एक नया नाम दे दिया.  

बर्फ के भैंस पर राजकुमार, पीछे छंगू झील (Tsomgo Lake)

मेरे छोटे राजकुमार की दृष्टी से सबसे सुन्दर लगने वाले “बर्फ के भैंस” यानि याक पर बच्चों की सैर शुरू हुई. बच्चों के चेहरे याक के पास पहुँचते ही आश्चर्यचकित और प्रसन्नता मिश्रित भाव से ओतप्रोत थे. सबसे पहले मेरे दोनों रतनधन दादागिरी कर याक पर सवार हो चुके थे, श्रीमतिजी के बहन के दोनों बच्चे आश्चर्यचकित होकर मुहँ खोले सिर्फ देख रहे थे, आखिर कर भी क्या सकते थे.

वैसे मेरे लिए भी “बर्फ के भैंस” को प्रत्यक्ष देखने का यह पहला ही अवसर था, श्रीमतिजी ने शायद अमरनाथ यात्रा में कहीं इस भैंस को देखा था. सांड जैसा तगड़ा मोटा, लंबे-लंबे काले और सफेद बाल, सींग सुन्दर तरीके से रंगीन सजाई हुई और बैठने के लिए रंगीन जीन ने “बर्फ के भैंस” को खूबसूरत तो बना ही दिया था पर उससे थोड़ी बदबू सी भी महसूस हो रही थी मुझे. पर दूसरी ओर कुछ लड़कियां और औरतें इस भैंसे से ऐसे चिपक-चिपक कर, किस्सी दे-दे कर फोटोसेशन करवा रहीं थी जैसे बिछड़े प्रियतमा से जन्मों-जन्मों के बाद मिलन हो रहा हो. भैंस वाले भाई ने हमें भी वैसे फोटो निकालने को, पर हम से ये न हो सका. आखिर इतनी बदबूदार जानवर को कोई किस्सी देने वाला न था हमारे साथ, तो फोटसेशन कुछ खास न रहा हमारा. मतलब भैंस भाई से हमारी मुलाकात रोमांटिक न हो सकी. बाकी सबको देखकर तो लग रहा था कि हमारी फिल्म में ये मातम का सीन चल रहा है. आखिर मन-मारकर उस खुशनसीब बर्फ के भैंस और बदनसीब लड़कियों और औरतों से नजर हटाया और अपनी कहानी में वापस आ गया. 

अले छोडो मेरे याक को तुम तो घूम लिये बाबा, छंगू झील (Tsomgo Lake)

तो, दोनों राजकुमारों की शान की सवारी निकली और छंगू झील (Tsomgo Lake) के नजारों और अलौकिक वातावरण का आनन्द लेते हुए सड़क पर यहाँ से वहाँ. याक वाले भाई ने दोनों बच्चों को “बर्फ के भैंस” का नाम “रेम्बों” बताया और बच्चों को मस्ती से घूमते-घुमाते बार-बार बता रहा था – “ये कोई ऐरा-गैरा याक नहीं है, सबसे सुन्दर और सबसे सबसे बढ़िया याक है. जिसका नाम “रेम्बों” है”. बच्चे भी रेम्बों-रेम्बों कर चिल्लाते रहे और “बर्फ के भैंस” ओ... ओ.... मतलब याक के सवारी का आनंद लेते रहे. मेरे दोनों बच्चों के बाद दोनों निरीह से बच्चे भी रेम्बों-रेम्बों की रट लगाते लद लिए और मेरे दोनों शैतान रेम्बों-रेम्बों कर डरते-डरते उसे छूने भी रहे. “ये कोई ऐरा-गैरा याक नहीं है, सबसे सुन्दर और सबसे सबसे बढ़िया याक है. जिसका नाम “रेम्बों” है” - ये हमें कई बार सुनने को मिले.

बच्चों की याक की सवारी और मौज-मस्ती के बाद हम वापिस हो रहे थे. लौटने हुए रास्ते में एक पड़ाव हमारा फिर से उस जगह था, जहाँ हमने जैकेट और बूट किराये पर लिए थे. जब तक हमने जैकेट और बूट वापस किए तब-तक ससुरजी के आर्डर किये गए गरमा-गरम मैग्गी भी बड़े से बाउल में हमारे सामने थे. सच पूछो तो पेट में चूहे कूद रहे थे, पर मैं गंगटोक पहुंचकर ही पेट-पूजा की सोच रहा था, दो मिनट में गरमा-गरम मैग्गी बाउल से ऐसे गायब हो गई थी जैसे वहाँ कुछ था ही नहीं. बाकी तो पहले ही बता चुका हूँ कि वहाँ खाने को हमारे लिए कुछ था ही नहीं. सिर्फ मटन और चावल का जुगाड़ था और हम ठहरे 100% शुद्ध शाकाहारी.


यहाँ से निकले तो रास्ते में बैग में पड़े नमकीन और अन्य व्यंजन का लुत्फ़ उठाते हुए पेट की अग्नि को शांत करते हुए, संध्या तक हम गंगटोक अपने होटल पहुँचे. शरीर थककर चूर हो चुका था. श्रीमतिजी ज्यादा परेशान दिख रही थी, क्योंकि मेरे छोटे राजकुमार ने पुरे रास्ते उनकी गोद में ही उधम मचाया कभी गाड़ी की सीट पर बैठे ही नहीं. गाड़ी ने हमें टैक्सी स्टैंड पर छोड़ा था क्योंकि शहर में नो एंट्री के वक्त बाहर जाने वाली गाडियाँ प्रवेश नहीं कर सकती और जैसा आप लोगों को मेरी पोस्ट पढ़कर पता चल ही गया होगा कि सिक्किम में ट्राफिक नियम सिर्फ कड़े  नहीं हैं, बल्कि लोग स्वत: ही इन नियमों का पालन भी करते हैं. यहाँ से हमें लोकल टैक्सी लेकर माल रोड़ पर ही स्थित अपने होटल पहुँचाना था. काफी देर की भाग-दौड़ और मसक्कत के बाद सिर्फ एक गाड़ी मिल पाई, जिसमें सिर्फ चार लोग ही जा सकते थे जो कि यहाँ का नियम है. सबको भेज दिया गाड़ी में बिठाकर, मेरे साथ श्रीमतिजी और मेरे बड़े सुपुत्र रह गए. आधे घंटे तक गाड़ी के लिए भागा-भागी करता रहा पर कोई फायदा न हुआ. एक खाली गाड़ी आती और लोग उसपर ऐसे टूटते जैसे मधुमक्खी अपने छत्ते में टूट पड़ती है. मुझे यह सब करने में बड़ा ही संकोच होता है, सच कहूँ तो ये मुझसे आज तक न हुआ.

आखिर खीजकर पैदल ही गूगल बाबा (मैप) के सहारे हम चल पड़े. 1 किलोमीटर से ज्यादा पैदल खुद को थके होने के बावजूद भी घसीट चुका था तो हमें एक खाली गाड़ी मिली और हम खुश हो लिए. पर हाय रे किस्मत, थोड़ी दूर जाकर ही जाम ऐसे फंसे कि ड्राईवर ने हाथ जोड़ दिए -आगे गया तो बाहर आना मुश्किल है तो आप यहाँ से पैदल ही चले जाइये. ड्राईवर ने पतली सी गली होकर मार्केट तक पहुँचने का शोर्टकट रास्ता बताया, जिसपर पूछते-पाछते हम बेहाल होकर माल रोड़ पर पहुँचे. कई बार तो समझ ही नहीं आ रहा था कि हम रास्ते पर चल रहे हैं या किसी के घर में प्रवेश करने वाले हैं. पहाड़ी रास्ते की तरह ऊपर नीचे जाती सीढियों की वजह से बेटे की हालत क्या हो रही होगी वो हम अपने थकान से अनुभव कर रहे थे. पर थोड़ी न-नुकर के बावजूद भी बेटे ने भी गंगटोक माल तक का लगभग 2 किलोमीटर तक का सफर फ़तेह कर लिया. बाद में पता चला कि जाम कई घंटे तक लगा रहा.

अब पेट में गणपति बाप्पा के मूषकराज उधम मचाये थे, तो सीधा माल रोड़ का रुख किए और माल के मार्केट में ही पतली सी नीचे जाती गली में स्थित मारवारी भोजनालय में छककर भोजन किया. जिसे हमने कल रात चहलकदमी करते वक्त देखा था. बाकी लोग होटल में ही खाना खाने वाले थे. मारवारी भोजनालय के भोजन ने मन तृप्त कर दिया, वरना NJP से लेकर दार्जिलिंग तक तीन दिनों तक जो खाना हमने खाया वो बिल्कुल ही बेस्वाद था और बस जीने के लिए खाने वाली बात हो रही थी. सबसे घटिया खाना हमने दार्जिलिंग के होटल में खाया था. दोनों दिन लेट होने की वजह से और कोई विकल्प नहीं रह जाता था.


चहलकदमी करते मैं, श्रीमतिजी और मेरे सुपुत्र होटल की बढ़ रहे थे की बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें टपकने लगी. वहीँ से एक बड़ा सा छाता ख़रीदा ताकि गीले न हो जाएँ और जल्द से होटल की ओर लपके. वैसे एक बात मैं दार्जिलिंग से नोटिस कर रहा था, यहाँ ज्यादातर इस्तेमाल होने वाले छतरी का आकार-प्रकार हमारे छतरी से काफी बड़ा था. तो बड़ा सा छाता इस यात्रा की निशानी के रूप में हम लोगों की एकमात्र शौपिंग थी. होटल के कमरे में बाकी के लोग भी खाना खा चुके थे और अब तो बस निद्रा देवी के आगोस में समाने को एक अदद बिस्तर की जरूरत थी. जिसकी 5000 रुपल्ली के इस सुइट में कोई कमी नहीं थी.

शुभ रात्रि



आगे जारी ...

यात्रा से लौटते हुए लिये गए फोटो →


ये कोई ऐरा-गैरा याक नहीं है, सबसे सुन्दर और सबसे सबसे बढ़िया याक है. जिसका नाम “रेम्बों” है





रास्ते से दिखता गंगटोक




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