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Monday, 31 December 2018

वर्ष 2018 के यात्राओं का लेखा-जोखा

2018 कुछ मामलों में मेरे लिए खास रहा- पुरे परिवार के साथ लंबी यात्रायें, बाइक द्वारा यात्रा कि शुरुआत, यात्रा वृतांत लिखने की शुरुआत, फोटो प्रितियोगिता में विजेता होना और इन सबसे बड़ी बात एक साहसी सोलो महिला यात्री से मुलाकात. वो साहसी और निडर, अध्यात्मिक सोलो यात्री थी मुम्बई, महाराष्ट्र की मिस ज्योति. जो कई महीनों से सोलो यात्रा कर रहीं हैं और आश्चर्य कि बिहार के दूर-दराज क्षेत्र को भी बड़ी आसानी से नाप डाला.

यह वर्ष कई सुखद अनुभूतियों के साथ विदा हो रहा है और नव वर्ष  का आगाज हो चुका है. नव वर्ष नई उमंगें, नई स्फूर्ति और नई आशाओं के साथ हमारे जीवन में नया सवेरा लेकर आये, इसी शुभकामनाओं के साथ.

नव वर्ष मंगलमय हो !
 
जनवरी -
1st जनवरी (डे विजिट)
फॅमिली ट्रिप
अध्यात्मिक यात्रा
बिहार योग विद्यालय, मुंगेर
रोड ट्रिप कार से
तय दूरी - 108 किमी
हर 1st जनवरी को नव वर्ष का आगाज गुरु आश्रम में अध्यात्मिक और यौगिक अन्तः यात्रा से होती है.
(अब इसकी जगह कुछ नया करें शायद या फिर कुछ भी न करें)
  
बिहार योग विद्यालय का वृहमगम दृश्य
फरवरी -
22 – 24 फरवरी  (डे विजिट)
फॅमिली ट्रिप
धार्मिक और साहसिक यात्रा
त्रिकुट पर्वत एवं बाबाधाम, देवघर 
रोड ट्रिप बस से
तय दूरी - 225 किमी
त्रिकुट पर्वत पर भारत के एक मात्र 45 डिग्री के एंगल पर बने उड़न खटोले (Roap Way) का आनन्द लेने के साथ त्रिकुट पर्वत पर मौजूद कई देवों के स्थान को देखा और ट्रेक्किंग का आनन्द लिया परिवार और छोटे बच्चों के साथ. अगले दिन सुबह भोले के दर्शन के बाद नवलक्खा मन्दिर और संध्या में नंदन पहाड़ में बच्चों ने झूलों और फिर सबने बोटिंग का आनंद लिया. बच्चों की यह पहली मस्ती भरी बोटिंग थी.  
 
त्रिकुट पर्वत उड़न खटोले (Roap Way) का आनन्द 
मार्च –
11 मार्च (डे विजिट)
माँ से साथ
अध्यात्मिक यात्रा
महर्षि मेंहीं आश्रम, कुप्पा घाट, भागलपुर
रोड ट्रिप बाइक से
तय दूरी - 16 किमी
संतमत के प्रवर्तक महर्षि मेंहीं द्वारा स्थापित कुप्पा घाट की माँ की पहली यात्रा. मैं अभी तक कितनी बार आ चुका हूँ शायद गिनती न कर पाऊं. पावन गंगा के तट पर बना कुप्पा घाट शान्ति और अध्यात्म के साथ लोगों के लिए थोड़ी समय के लिए घूम कर शान्ति को महसूस करने का एक महत्पूर्ण स्थल है भागलपुर में. कहा तो यह भी जाता है कि यहाँ कर्ण की मुंगेर के चंडिका स्थान जाने वाली सुरंग भी हैं. वैसे अब पूरी तरह से क्षतिग्रस्त होने की वजह से इसे बन्द कर दिया गया है.
अप्रैल -
4 – 8  अप्रैल
माँ से साथ
लखनऊ यात्रा
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 1505 किमी
रोड ट्रिप कार से
तय दूरी - 100 किमी

लगभग चार साल के बाद नबाबों के शहर लखनऊ जाना हुआ. वैसे तो यह पारिवारिक यात्रा थी पर इसमें भी हमने खुब आनन्द लिया. पहली बार कुकरैल, जिग्नेश मिश्रा पार्क और आंबेडकर पार्क देखने का मौका मिला. कुकरैल में घरियाल प्रजनन केन्द्र है, लखनऊ जैसे भीड़-भाड़ वाले शहर में जंगल का आनन्द आ गया. जिग्नेश मिश्रा पार्क भी खूबसूरती की मिसाल ही है. आंबेडकर पार्क में पार्क जैसा कुछ तो न था पर गरीबों के पैसे और मार्वल जैसे कीमती पत्थर की बर्बादी का बेहतरीन उदाहरण लगा मुझे.
नवाबों के शहर की नवाबी रेलवे स्टेशन 
मई – जून  
28 मई – 02 जून
फॅमिली ट्रिप
हिल स्टेशन और दुर्गम यात्रा
दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 833 किमी
रोड ट्रिप कार से
तय दूरी - 500 किमी
ट्रेक – 12 किमी
परिवार के साथ-साथ ससुराल के लोगों के साथ यह पहली हिल स्टेशन की यात्रा थी, यहाँ खूबसूरती का भरपूर लुत्फ़ उठाया. दार्जिलिंग तो खूबसूरत थी पर गंगटोक और सिक्किम ने जैसे दिल ही चुरा लिया. यही वजह है की 6 महीने बीतने के बाद भी इस यात्रा को बस अभी किया ऐसा महसूस होता है. यह यात्रा मेरी अभी तक की सभी यात्राओं में सबसे बेहतरीन यात्रा रही. गर्मी की छुट्टियों की वजह से यह यात्रा हमारे बजट से बाहर हो गई पर फिर भी हमें इसका कोई मलाल नहीं.
सिक्किम....  मैं फिर आऊँगा मेरी जान. दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा वृतांत को पढ़ने के लिए यहाँ जायें.
नाथुला और बाबा मन्दिर के पहले गर्मी में बर्फ का मजा
जून  -
06 – 08 जून
माँ से साथ
एक गाँव की यात्रा
पूर्णियां,पूर्णियां, बिहार
रोड ट्रिप बस से
तय दूरी - 200 किमी
एक टिपिकल देहात में जाकर दो दिन रहने का मौका मिला जहाँ जाकर पता चला कि बिहार में शराबबंदी तो सिर्फ एक शिगूफा है, गाँव-देहात में अगर विकास हुआ है तो पतन के मार्ग पर. दुखद सत्य के दर्शन हुए. गाँव में सुविधाओं की अब कोई कमी नहीं पर पतन के मार्ग भी फोरलेन की तरह सुपर फास्ट हो गए.

जुलाई  -
24 – 26 जुलाई
माँ से साथ
अध्यात्मिक यात्रा
बिहार योग विद्यालय, मुंगेर
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 100 किमी
रोड ट्रिप ऑटो से
तय दूरी – 20 किमी

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बिहार योग विद्यालय, गंगा दर्शन में प्रवास लगभग 7 – 8  वर्ष बाद हुआ. आनन्द की अनुभूति अपने चरम पर थी, जिसका वर्णन शब्दों से परे है.
गंगा दर्शन में सत्संग 
सितम्बर  -
10 – 13 सितम्बर
माँ से साथ
अध्यात्मिक यात्रा
बिहार योग विद्यालय, मुंगेर
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 100 किमी
रोड ट्रिप ऑटो से
तय दूरी – 20 किमी
सन्यास पीठ की लक्ष्मी-नारायण कार्यक्रम में आश्रम प्रवास कर शामिल होने का परम सौभाग्य पहली बार मिला. आश्रम जीवन को तरसती मेरी आत्मा जल बिल मछली सी हो रही थी, जिसे इस वर्ष गुरु कृपा ने सराबोर कर दिया. अध्यात्मिक और यौगिक जीवन दर्शन का संगम स्थली है गंगा दर्शन और सन्यास पीठ.  

अक्टूबर –
10 अक्टूबर
ऑफिस के बंगाली सहयात्री के साथ
धार्मिक / धरोहर
बटेश्वर स्थान और विक्रमशिला
मेरी पहली बाइक यात्रा
तय दूरी - 100 किमी
ट्रेन कैंसिल होने की वजह से एक लंबी यात्रा रद्द होने से मन खिन्न था, बस बैठे-बैठे पहली बाइक यात्रा का प्लान बना और अगले दिन चल पड़े बटेश्वर स्थान और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की ओर. सन 2008 के बाद दस साल से भी अधिक समय बाद मैंने इतनी लंबी बाइक यात्रा की, वरना मैंने 15-20 किलोमीटर से ज्यादा इन सालों मैं कभी ड्राइव नहीं किया. बटेश्वर स्थान में गंगा स्नान किया, जो की मेरे चंद गिने-चुने गंगा स्नान में सुमार हो गया. बिहार के गौरवशाली इतिहास विक्रमशिला विश्वविद्यालय को देख भाव-विभोर हो उठा. इस यात्रा वृतांत को पढ़ने के लिए यहाँ जायें. 
विक्रमशिला विश्वविद्यालय, कहलगांव, भागलपुर 
अक्टूबर –
14 – 17 अक्टूबर
फॅमिली ट्रिप
अध्यात्मिक यात्रा
रिखिया पीठ, देवघर
रोड
ट्रिप बस से
तय दूरी - 240 किमी
नवरात्रि साधना की लिए अगर आश्रम का परिवेश मिल जाये और साथ में रामायण, भागवत तो क्या कहना. वही हमने पुरे परिवार के साथ इस बार किया. बच्चों को तो जैसे स्वर्ग मिल गया हो, किलकारी, उधम मचाते इनके चेहरे पर खिले फूलों की चमक आ गई थी. उनको रामायण और भागवत से क्या करना, उधम मचाने को विशाल परिसर और मौज-मस्ती पुरे दिन जो करने को मिल गया था.
रिखिया पीठ , देवघर 
नवम्बर –
18 नवम्बर
फॅमिली + सिस्टर फॅमिली ट्रिप
ट्रेक / धार्मिक यात्रा
मंदार हिल
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 50 किमी
रोड ट्रिप ऑटो से
तय दूरी – 60 किमी
छोटी बहन और बहनोई पधारे और मेरी यात्रा वृतांत का असर था की सीधी फरमाइस “मंदार हिल” जाना है. बस फिर क्या था, मुहूर्त निकाल चल पड़े एक छोटे से ऐडवेंचरस ट्रेक पर, और वो भी तीन 6 और 4 साल के बच्चों के साथ. पिछले साल ही बच्चों के साथ 27 दिसम्बर को मंदार हिल की ट्रेक पिकनिक की तरह की थी. बस बोटिंग रह गई थी सहकर्मी की घर वापसी की व्यग्रता की वजह से, जिसका मजा इस बार लिया गया. बच्चों को तो बहुत मजा आया.
पपहरनी के बीच स्थित लक्ष्मी-नारायण मन्दिर 
दिसम्बर –
25 दिसम्बर
एक साहसी सोलो महिला यात्री के साथ
ट्रेक / धार्मिक यात्रा
मंदार हिल
मेरी दूसरी बाइक यात्रा
तय दूरी - 108 किमी
आभासी दुनिया के लोग जब मिलते हैं और वो भी दो पागल एक ही “घुमक्कडी” धुन के पक्के तो कैसा लगता है, यह आभास 24 – 27 दिसम्बर को जानने का मौका मिला. इस  साहसी, निडर सोलो महिला यात्री ज्योति मोटा के साथ फिर से 25 दिसम्बर को मौका मिला मंदार हिल जाने का, यह दो महीने में मेरी दूसरी बाइक यात्रा हो गई. यहाँ कई नई जानकारी मिली.

मैं और मेरी बसंती (मंदाचल के तलहटी में, पीछे मंदार पर्वत) 
दिसम्बर –
26 दिसम्बर
एक साहसी महिला सोलो यात्री के साथ
धार्मिक यात्रा
जैन मन्दिर, चम्पापुरी
रोड ट्रिप बाइक से
तय दूरी – 14 किमी
भागलपुर की चम्पापुरी जैन धर्म के नक्से पर एक महत्पूर्ण स्थान रखता है, क्योकिं यहाँ 12 वें तीर्थकर के पाँचों कल्याणक यहीं हुए. पर मैं अभी तक आ नहीं पाया था, कारण इन मन्दिरों का लोकल दर्शनार्थियों को रोक-टोक की नीति. खैर, साहसी सोलो महिला यात्री ज्योति मोटा के साथ
पुरे परिवार को मौका मिला यहाँ आने और दर्शन करने का. जैन तीर्थ में चम्पापुरी (जिसे हम नाथनगर कहते हैं) एक अति महत्वपूर्ण तीर्थ है पर जैन मन्दिर सरकार और लोकल प्रशासन की उपेक्षा का शिकार है.
जैन मन्दिर, चम्पापुरी 
दिसम्बर –
27 दिसम्बर
एक साहसी सोलो महिला यात्री के साथ
धार्मिक / धरोहर
बटेश्वर स्थान और विक्रमशिला
मेरी तीसरी बाइक यात्रा
तय दूरी - 108 किमी
10 अक्टूबर के फिर से मौका मिला बटेश्वर स्थान और विक्रमशिला विश्वविद्यालय आने का और कारण थी साहसी सोलो महिला यात्री. मेरी तीसरे बाइक यात्रा कई मायने में बेहतरीन रही. कई नए अनुभव हुए, यात्रा वृतांत लिखा जाना बाकी है.
बटेश्वर स्थान गंगा किनारे श्रद्धा के रंग 

ट्रेन यात्रा कुल दूरी – 2588 किमी
रोड यात्रा कुल दूरी – 1830 किमी (बाइक यात्रा शामिल)
कुल बाइक यात्रा – 330 किमी.




Wednesday, 19 December 2018

रहस्यमयी "बाबा मन्दिर" का रहस्य

दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 7

रहस्यमयी "बाबा मन्दिर" का रहस्य


इस  अमर शहीद की आत्मा आज भी करती है देश की रक्षा

"पंजाब रेजिमेंट के जवान हरभजनसिंह की आत्मा पिछले 50 सालों से लगातार देश की सीमा की रक्षा कर रही है।"


सैनिकों का कहना है की हरभजन सिंह की आत्मा, चीनी सेना की गतिविधियों की जानकारी अपने मित्रों को सपनों में देते रहे, जो हमेशा सच साबित होती थीं। और यदि भारतीय सैनिको को चीन के सैनिको का कोई भी मूवमेंट पसंद नहीं आता है तो उसके बारे में वो चीन के सैनिको को भी पहले ही बता देते हैं, ताकि बात ज्यादा नहीं बिगड़े और मिल जुल कर बातचीत से उसका हल निकाल लिया जाए। और इसी तथ्य के आधार पर उनको मरणोपरांत भी भारतीय सेना की सेवा में रखा गया। आप चाहे इस पर यकीं करें या ना करें पर खुद चीनी सैनिक भी इस पर विश्वास करते हैं। इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में बाबा हरभजन सिंह के लिए एक खाली कुर्सी लगाईं जाती है, ताकि वो मीटिंग अटेंड कर सके। इन्हीं वजहों से हरभजन सिंह को नाथुला का हीरो कहा जाता हैं।

बाबा हरभजनसिंह मन्दिर 

कौन है हरभजन सिंह :
हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, जिला गुजरावाला जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है, हुआ था। हरभजन सिंह 24 वीं पंजाब रेजिमेंट के जवान थे, जो की 9 फरवरी, 1966 में आर्मी में भर्ती हुए थे। पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 4 अक्टूबर 1968 को खच्चरों का काफिला ले जाते वक्त पूर्वी सिक्किम के नाथूला दर्रे के पास उनका पांव फिसल गया और घाटी में गिरने से उनकी मृत्यु हो गई।  पानी का तेज बहाव उनके शरीर को बहाकर 2 किलोमीटर दूर ले गया। दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी शव की जगह बताई, खोजबीन करने पर तीन दिन बाद भारतीय सेना को बाबा हरभजन सिंह का पार्थिव शरीर उसी जगह मिल गया, जो उन्होंने अपने साथी को सपने में बताया था। हरभजन सिंह का पुरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। उसके बाद दिन-ब-दिन उनके चमत्कार बढ़ते गए, हरभजन सिंह के चमत्कारों के कारण साथी सैनिकों की उनमें आस्था बढ़ती गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया। बाबा हरभजन सिंह के चमत्कार बढ़ते-बढ़ते विशाल जन समूह की आस्था का केंद्र हो गए, तो उनके लिए एक नए मंदिर का निर्माण किया गया जो की ‘बाबा हरभजन सिंह मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर छांगू लेक के आगे और नाथुला दर्रे के पास, 13000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। बाबा का बंकर वाला मंदिर इससे भी 1000 फ़ीट ऊपर है। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और पास ही उनके सोने का कमरा भी बना है। जिसमें सोने के लिए बिस्तर के साथ उनका अन्य सामान, जूते और ड्यूटी की वर्दी रखी है।
 
बाबा हरभजनसिंह मन्दिर

आज भी देते है ड्यूटी :
बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे है। इनके लिए उन्हें बाकायदा तनख्वाह भी दी जाती है, उनकी सेना में एक रेंक है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है। यहां तक की उन्हें कुछ साल पहले तक अन्य सिपाहियों की तरह ही 2 महीने की छुट्टी पर गाँव भी भेजा जाता था। इसके लिए ट्रेन में सीट रिज़र्व की जाती थी, तीन सैनिको के साथ उनका सारा सामान उनके गाँव भेजा जाता था तथा दो महीने की छुट्टी पुरे होने पर फिर बाबा हरभजन सिंह को वापस सिक्किम लाया जाता था। जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस दरमियान पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था, क्योकि उस वक़्त सैनिको को बाबा की मदद नहीं मिल पाती। लेकिन बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जमा होने लगी थी। कुछ लोगों ने इस आयोजन को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला मान अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास की मनाही होती है, लिहाज़ा सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया। अब बाबा साल के बारह महीने ड्यूटी पर रहते है। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है। जिसमें प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते है। बाबा की सेना की वर्दी और जुते रखे जाते हैं। कहते है की रोज़ पुनः सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सीलवटे पाई जाती है।



बाबा का बंकर, जो 14000 फीट पर स्थित है, लाल और पीले रंगों से सजा है। सीढ़िया लाल रंग की और पिलर पीले रंग के। सीढ़ियों के दोनों साइड रेलिंग पर नीचे से ऊपर तक घंटिया बंधी है। बाबा के बंकर में कॉपियाँ रखी हैं। इन कॉपियों में लोग अपनी मुरादे लिखते है, ऐसा कहा जाता है की इनमें लिखी गई हर मुराद पूरी होती है। बंकर में एक ऐसी जगह है जहाँ लोग सिक्के गिराते हैं, यदि वो सिक्का उन्हें वापस मिला जाता है तो वो अपने को भाग्यशाली मानते हैं। फिर उसे हमेशा के लिए अपने पर्स या तिजोरी में रखते हैं। दोनों जगहों का सम्पूर्ण संचालन आर्मी के द्वारा ही किया जाता है।

लोगों की आस्था का केंद्र है बाबा मंदिर :
बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सैनिको और लोगो दोनों की ही आस्थाओ का केंद्र है। इस इलाके में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा के मन्दिर में हाजरी देता हैं।  इस मंदिर को लेकर यहाँ के लोगो में एक अजीब सी मान्यता है। इस मंदिर में बोतल में पानी भरकर तीन दिन के लिए रख दिया जाए तो उस पानी में चमत्कारिक औषधीय गुण आ जाते है।  इस पानी को पीने से लोगों के रोग मिट जाते हैं। इसलिए इस मंदिर में नाम लिखी हुई बोतलों का अम्बार लगा रहता है। यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग में लाया जाता है, इस दौरान मांसाहार और शराब का सेवन निषेध होता है।

सेल्फी ले ले रे...... बाबा मन्दिर में भीड़ के बीच एक सेल्फी 

Friday, 30 November 2018

दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 6

एक रहस्यमयी मन्दिर की यात्रा  


मनभावन दृश्य बाबा हरभजनसिंह मन्दिर से 

अब तक आपने पढ़ा “दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा” में हम बाबा हरभजनसिंह मन्दिर तक पहुंचे थे, रास्ते में एक सुखद और आश्चर्यजनक अध्यात्मिक अनुभव भी हुए, जिसके बारे में छंगू झील (Tsomgo Lake) और बाबा हरभजनसिंह मन्दिर पढ़कर जाना जा सकता है। “दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा” के पिछले सभी पोस्ट को पढ़ने के लिए नीचे पोस्ट के अंत में लिंक दिए गए हैं, जहाँ आप इस सीरीज के सारे वृतांत पढ़ सकते हैं। अब पढ़िए आगे -


मानसरोवर यात्रा का नया मार्ग

बाबा हरभजनसिंह मन्दिर के बाहर 


बाबा हरभजनसिंह मन्दिर के प्रांगण में दाखिल होते समय ड्राइवर महोदय के बताने पर कि मन्दिर आ गया मैं विचारशुन्‍यता और अचंभित करने वाले हाई वोल्टेज अध्यात्मिक अवस्था से बाहर आया। यह सुखद एहसास शाम तक पूरे यात्रा में खुमारी बनकर छाई रही। मुझे बाबा हरभजनसिंह मन्दिर के बारे में जरा भी भान नहीं था कि यहाँ क्या है, न ही मैंने कोई जानकारी हासिल करने की कोशिश की थी। बाबा मन्दिर सुनकर लगा था कि भोलेनाथ का मन्दिर होगा, यहाँ के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है, इसकी जानकारी होटल मैंनेजेर और रास्ते में ड्राईवर से मिल चुकी थी।


आसपास का जायजा लेते हुए 

दिल कहे रुक जा रे रुक है यहीं पर कहीं ....  जो बात इस जगह, वो कहीं पर नहीं 

गाड़ी से बाहर आकर मैंने आसपास का मुआयना किया, पार्किंग में 250-300 गाड़ियां का सैलाब देख दंग रह गया। इतनी ऊँचाई पर भी इतनी भीड़, बिल्कुल मेला लगा था। मौसम का मिजाज पकड़ में ही नहीं आ रहा था, कहीं तेज धूप, कहीं उमड़ते-घुमड़ते बादलों का समुन्दर जैसे बस जल कुंभ उड़ेलने को बेकरार हों । अगला पल कैसा होगा ये अंदाजा ही नहीं लग पा रहा था। ठंड तो ज्यादा महसूस नहीं हो रही थी, वैसे हमने मोटे-मोटे जैकेट भी तो पहन ही रक्खे थे, पर हमने एक घंटे पहले तापमान चेक किया था जो 1° डिग्री सेल्सियस बता रहा था। हम आगे बढ़ने के पहले मौसम का अंदाजा लगा लेना चाहते थे, क्योंकि बच्चों को इतनी ठंड में किसी भी हालत में गीला करने के मूड में नहीं थे। जहां हम खड़े थे वहां से थोड़ी दुर ऊँचाई पर एक झरना मूसलाधार अनवरत गिर रहा था और साथ में भोलेनाथ की एक विशाल प्रतिमा भी दिख रही थी, जिससे मेरे अंदाजे को बल मिला कि यहाँ भोलेनाथ का मन्दिर है। क्योंकि हमलोग बाबा साधारणतया भोलेबाबा को ही पुकारते हैं।


बाबा हरभजनसिंह मन्दिर से दिखता शिव जी की मूर्ति और झरझर बहता ठंडा-ठंडा झरना 

चारों बच्चे सो रहे थे, सबको जगाया गया, पर मेरे छोटे राजकुमार जगने को तैयार ही नहीं थे। आखिर हमने उसे ड्राइवर के भरोसे गाड़ी में ही छोड़, इस यात्रा के अन्य तीन छोटे सहयात्रियों के साथ चल पड़े। पार्किंग में लगे बोर्ड पर दी गई जानकारी को पढ़कर मुझे वहाँ के बारे में थोड़ी जानकारी मिली, जो मेरी सोच से अलग और हैरान करने वाली थी। अब ऐसी क्या सूचना थी ये आपको आगे बताऊंगा ।


बाबा हरभजनसिंह मन्दिर और शिव मूर्ति के बीच बहता निर्मल शीतल जल  

हम आगे बढ़े ही थे कि हमें वाटरफाल से गिरते तेज पानी की धार एक छोटी नदी का रूप धारण कर तेज गति से बह रही थी मिल गई, जो बड़े-बड़े चट्टानों और पत्थरों के बीच से गुजरने के कारण मनमोहक तो लग ही रही थी, पुरे वातावरण को और दिलकस बना रही थी। बस फिर क्या था, हम वहीँ थम गये। वहाँ का नजारा इतना आकर्षक और जीवंत था कि किसी भी प्रक्रति प्रेमी को मोहपाश में ले ले। बहते पानी के ऊपर चट्टानों को खूबसूरती से सजाकर बनाया गया पुलिया। हम पानी में संभल कर उतर गये। पानी गहरी नहीं थी, हम बड़ी चट्टानों का सहारा लेकर बीच में पहुँच गये और बड़े-बड़े चट्टानों पर कब्ज़ा जमाकर बैठ गये। पानी में हमें भींगने का कोई डर तो था नहीं कम से कम घुटने तक, क्योंकि हमने रबड़ या प्लास्टिक जाने क्या था का बूट भी पहन रखे थें।


शान्ति और आनन्द को रोमकूप में महसूस करता 

कल-कल करता निर्मल पावन जल, जैसे संगीत के साथ अलमस्ती में बेपरवाह बहता जा रहा था और जीवन का मूलमंत्र "जीवन चलने का नाम" देता जा रहा था। शान्ति और आनन्द जैसे प्रत्येक रोमकूप में समां कर काया और मन को प्रफुल्लित कर चैतन्यता की अवस्था में ले जा रहे थे। ऐसा महसूस हो रहा था जैसे आनन्दमय कोष जागृत हो गया हो। आनन्द की जिस अवस्था को मैंने यहाँ चलते-फिरते महसूस किया, उस आनन्दमय अवस्था को पाने और महसूस के लिए अठारह सालों से ध्यान और मन्त्रों का जाप कर रहा हूँ, पर सफलता कोसों दूर खड़ी है जैसे।


सुनो, एक जरूरी बात... मरने के पहले सिक्किम जरूर देखना, वरना उपर मुहँ दिखाने लायक नहीं बचोगे 

वैसे तो हम सबने बूट पहन रखा था, पर पानी में पैर लटका कर बैठने के कारण पैर बिल्कुल सुन्न हुआ जा रहा है। थोड़ी देर वैसे ही बैठे रहे, फोटो लिए, अपनी भी फोटो खिंचवाई। लोग आते-जाते हमें पानी में पत्थरों पर बैठ अटखेलियाँ करते देखते-घूरते आगे बढ़ रहे थे। एक्का-दुक्का को हमारे पागलपन का तरीका पसंद आया तो वो भी पानी में कूद पड़े, फोटो ली और चले गये। काले उमड़ते-घुमड़ते बादलों ने मौसम का मिजाज डरावना बना दिया, चारों ओर अंधेरा छाने लगा तो हम भी तेजी से पहाड़ी की ओर आगे बढ़ने लगे। जैसे ही हम पहाड़ी के निकट पहुंचे, यहाँ से हमें ऊपर की ओर चढ़ाई करना था। बारिश की बूंदें गिरने लगी, पहले तो लगा बारिश नहीं होगी, हम झरने के पास बैठ मजे करने लगे। थोड़ी देर में बारिश की बूंदें तेज गिरने लगी, आसपास कुछ छुपकर बचने लायक स्थान दिखाई नहीं दे रहा था। आखिर में हमने वापस होने का फैसला किया और तेजी से पार्किंग की ओर भागे।   

तेज कदमों से भागते टैक्सी स्टैंड पहुंचे, ‌बारिस थम चुकी थी। अब सबको वापस लौटने का मलाल होने लगा। छोटे बेटे को देखा वो अब भी सो ही रहा था। उसे जागकर हम टैक्सी स्टैंड के पास ही लोगों की भीड़ देख उधर चल पड़े। असल में मैंने आपको अब तक यह नहीं बताया कि स्टैंड में लगे बोर्ड में क्या जानकारी देखी थी, जो मेरी सोच और बाबा मंदिर के बारे में खींचे गए खाके से बिलकुल मेल नहीं खा रही थी।

वहाँ बोर्ड पर जो सुचना दी गई थी, इस प्रकार थी -

शिवजी की मूर्ति

  • 13000 फीट की ऊंचाई पर बाबा हरभजनसिंह मन्दिर नम्नांग चाऊ झरने के तलहटी में स्थित बैठे हुए शिवजी की यह बैठी मूर्ति विश्व की सबसे ऊँचाई पर स्थित शिवजी की मूर्ति है।
  • भगवान शिवजी की यह मूर्ति 12 फीट ऊँची है और उच्च स्तर के फाइबर ग्लास से निर्मित है, यह  ऋषिकेश की भगवान शिव की मूर्ति की प्रतिकृति हैं।
  • यह पुरा प्रोजेक्ट आर्मी के 18 JAK RIF द्वारा प्लान और निर्माण किया गया और इसका रख-रखाव पूरी तरह से आर्मी द्वारा ही किया जाता है।
  • यह यहाँ से 500 मीटर की दूरी पर स्थित है और यहाँ पहुँचने में 12 मिनट का समय लगता है।

बैठे हुए शिवजी की मूर्ति के बारे में जानकारी 

मुझे इस सूचना में जो खास और आश्चर्यजनक लगा वो था- बैठे हुए भगवान शिव की सबसे ऊँचाई पर स्थित मूर्ति की जानकारी और इस मन्दिर का आर्मी द्वारा संचालित होना। मन में तरह-तरह विचार पनपने लगे, आखिर आर्मी किसी मन्दिर का संचालन क्यों कर रही है? आखिर माजरा क्या है ? मैं असमंजस में पड़ा था, ये क्या है भाई ? आखिर लोग इतनी ऊँचाई पर इस मन्दिर में दर्शन करने क्यों आ रहे हैं? कुछ पल पहले मुझे साक्षात् शिव के दर्शन होने का आभास हो रहा था, मतलब यहाँ भगवत कृपा बरस रही है और यहाँ की उच्च आध्यत्मिक उर्जा को महसूस किया जा सकता है, अगर आपके अन्दर ग्रहणशीलता हो। हम ठहरे निरे मुर्ख-अधम-पापी-लोभ-काम-मोह-माया में निर्लिप्त पशुवत मानव जिसे सिर्फ साकार रूप ही समझ आता है, निर्विकार चिदानंद स्वरुप अपने नेटवर्क के बाहर की बात है। यहाँ तो शिव की मूर्ति ऊपर खुले में रखी है, जहाँ तक हमलोग जाने के पहले ही वापस आ गए। मतलब लोग इसे पूजते तो नहीं ही होंगे यह पक्का है। तो आखिर आने वाले दर्शनार्थी अपनी श्रद्धासुमन किस दर अर्पित करते हैं ? आखिर मन्दिर कहाँ है? रास्ते में लोगों ने बताया मन्दिर स्टैंड के साथ ही है, पर यहाँ तो मन्दिर जैसा कुछ दिख नहीं रहा भाई। ये माजरा क्या है???

मन में कई सवाल विद्रोह कर रहे थे, जिनके दमन के लिए हम आगे बढ़े। मेरे लिए बाबा मन्दिर पूरी तरह से सस्पेंस बन चुका था, जिसपर से पर्दा उठना बाकी था।

हमें जहाँ भीड़ नजर आ रही थी, वहाँ बाहर एक बोर्ड फिर से नजर आया और आदतन मैं सीधा बोर्ड की तरफ बढ़ गया। इस बोर्ड को पढते-पढते मेरा मुँह खुला का खुला रह गया और सारे धुंध मिट गए। मतलब यह पंजाब रेजीमेंट के एक सिपाही की समाधी स्थल और मन्दिर है। आश्चर्यजनक और अजूबा लगा, जिज्ञासा और बढ़ गई। मन में सवाल तो उमड़-घुमड़ रहें थे, आखिर एक सैनिक का मन्दिर और हजारों लोग दर्शन करने आते हैं। क्यों ???

बोर्ड से मिली जानकारी ने तो जैसे मुझे कस्तूरी मृग ही बना डाला। जिज्ञासा और बलवती हो गई, आखिर माजरा क्या है? लाखों सैनिकों की जान जाती है पर बाबा हरभजनसिंह का ही मन्दिर क्यों ??? खैर, जैसे ही मुझे जानकारी मिलेगी, आपको भी बताऊंगा। मन्दिर के चबूतरे पर तिल रखने की जगह नहीं। वहाँ बाबा हरभजनसिंह की समाधी बनी थी, हमने भी अपनी श्रद्धासुमन अर्पित किये उस विलक्षण सैनिक को। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और पास ही उनके सोने का कमरा भी बना है। जिसमें सोने के लिए बिस्तर के साथ उनका अन्य सामान, जूते और ड्यूटी की वर्दी रखी है। हमने वहाँ एक-आध फोटो ली, थोड़ा समय वहाँ बैठ बिताने का विचार था पर भीड़ की वजह से हमें मन्दिर से बाहर आना पड़ा।


अद्भुत सैनिक बाबा हरभजनसिंह का मन्दिर

बाबा हरभजनसिंह मन्दिर 


मन्दिर के सामने सुन्दर कैफेटेरिया बना था, थोड़ा पेट पूजा करने के विचार से आगे बढ़ा ही था की श्रीमतिजी को चक्कर आने लगी और गिरते-गिरते बची और कैफेटेरिया के पास ही चबूतरे पर निढाल हो बैठ गई। ये लक्षण High Altitude Sickness के थे, जिसकी वजह से वो ठीक से साँस नहीं ले पा रही थी। चुकी 14000 फीट की ऊंचाई पर चढाई करने का हमें कोई अनुभव नहीं था, तो हमारे पास ऐसी मुश्किलों का सामना करने के लिए कोई दवाई भी उपलब्ध नहीं थी। सहारा देकर कैफेटेरिया में ले जाकर एक खाली सोफे पर बिठाया, वो ठीक से सांस नहीं ले पा रही थी। अब ऐसी परिस्थिति में अपने सुझबुझ से ही काम लेना पड़ेगा। जहाँ तक मुझे समझ आ रहा था, अपना दिमाग लगाया और सबसे पहले थोड़ा पानी पिलाया और दार्जिलिंग से गंगटोक आते वक्त रास्ते में जो चॉकलेट की खरीदारी की थी, वो हम रास्ते में समय-समय पर खाते रहे थे, उसमें से एक चॉकलेट श्रीमतिजी को खाने को दिया। श्रीमतिजी के चॉकलेट खाने के बाद लंबी-लंबी सांसे लेने को बोल, एक-दो हाजमोला की गोली भी मुहँ में रखने को दे दिया। अब फिर से पानी मांग रही थी, हमारा पानी का स्टॉक समाप्त हो चुका था।

वहाँ काउन्टर पर भी पानी की बोतल समाप्त हो चुकी थी, सिर्फ टमाटर का सूप, चाय, बिस्किट और केक बचा था। काउन्टर पर भीड़ कम ही थी, तो मैं वहाँ काउन्टर पर बैठे सैनिक भाई से बाबा मन्दिर के बारे में बातचीत करने लगा। यह सबसे बढ़िया माध्यम होता है कहीं भी जानकारी जमा करने का, इस युक्ति से जमा किये गए जानकारी गूगल बाबा को भी मत दे देते हैं कई बार। इस जगह के बारे में कई चौकाने वाली जानकारी के साथ, मैंने तीन बड़ों और दो बच्चों के लिए सूप, केक और चाय (चाय दो मात्र) ली, क्योंकि बाकी लोग पेट पूजा कर निकाल चुके थी। गरमा-गरम सूप लेने के बाद श्रीमतिजी कुछ बेहतर महसूस कर रही थी, पर लगातार पानी की मांग कर रही थी। पानी शायद ही गाड़ी में भी हो। खैर, थोड़ी देर में बेहतर महसूस करने लगी और हम फिर से बाहर की ओर निकलने वाले थे कि मेरी नजर वहाँ पड़े टेबल पर गई, जिसे लोगों ने डस्टबिन बना दिया था। 

मेरे बगल के सोफे पर बैठे एक बंगाली जोड़े ने भी उस टेबल को डस्टबिन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। जब मुझ से यह सब देखा नहीं गया तो मैंने उनको अगली बार टेबल को डस्टबिन के रूप में उपयोग के पहले टोका – “भाई साहब, आपलोग ये क्या कर रहे हो??? बगल में ही डस्टबिन रखी है जरा उठकर उसमें डाल दीजिए। इस तरह इस खूबसूरत जगह की खूबसूरती को नष्ट क्यों कर रहे हैं???


तथाकथित सभ्रांत और हाई क्लास एजुकेटेड गधों की करतूत  

तथाकथित सभ्रांत कहे जाने वाले हाई क्लास एजुकेटेड दंपत्ति में से मिसेस ने महारानी विक्टोरिया सी टेढ़ी-मेढ़ी भाव-भंगिमा बना तपाक से अंग्रेजी में बिना एक क्षण गवाए उत्तर दिया –

“Mind Your Own Business Please.
I’m not bothering what you are doing, then why you are?”

मैं तो हतप्रद सा देखता रह गया, मैंने उनको समझाने की कोशिश की –

“You are destroying the beauty of this place, please keep this place clean for others as you received.”

अब तो महारानी विक्टोरिया की ऑंखें लाल पीली हो गई, अजीब सा मुहँ बन गया। और अगले ही क्षण सूप के कप और और बिस्किट के रेपर मुझे दिखाते हुए वापस उसी टेबल पर बड़े स्टाइल से दे मारा। मैं समझ गया किसी पढ़े-लिखे तथाकथित सभ्रांत और बिगडैल गधों से पला पड़ा है। वैसे भी मेरा भेजा कुछ जल्दी गरम हो जाता है, तो मैं बात को आगे न बढ़ाते हुए, बड़े रोब से उठा और उनके जैसे लोगों द्वारा किए गए करतूतों से टेबल की जो हालत हुई थी की फोटो ली और चुपचाप वहाँ से निकाल गया। ऐसे लोगों को समझाना शायद ब्रह्मा के बस के भी बाहर है।


तथाकथित सभ्रांत और हाई क्लास एजुकेटेड गधों की करतूत  

दिमाग गुस्से से भनभना रहा था, मन तो किया कि वापस जाकर दो-चार उल्टे-सीधे पंच दे मारूं। पर अपनी यात्रा को लड़ाई-झगडे की बली नहीं चढाना चाहता था। मन मार कर गाड़ी की आगे बढ़ गया, अब हमें वापस जाना था। बाकी लोग पहले ही गाड़ी में बैठे मेरा इंतजार कर रहे थे। अब आप कहेंगे मैंने सैनिक भाई से कैफेटेरिया के  काउंटर पर जो चौकाने वाली जानकारी जमा की, वो नहीं बताया। तो बात ये है कि यह यात्रा वर्णन लंबी हो चुकी है और उस जानकारी को मैं चंद शव्दों में समेट कर नाइंसाफी नहीं करना चाहता। तो बाबा मन्दिर की आश्चर्यजनक और चौकाने वाली जानकारी अगले पोस्ट में लेकर आपके सामने पेश होता हूँ।



बाबा हरभजनसिंह मन्दिर यात्रा के दौरान लिये गए अन्य फोटो →


बाबा हरभजनसिंह मन्दिर के आसपास कहीं 

बाबा हरभजनसिंह मन्दिर के पार्किग का छोटा सा हिस्सा 

बाबा हरभजनसिंह मन्दिर के पार्किंग से दिखता दूर शिव जी की मूर्ति और झरना 

नज़ारे ऐसे की इंसान खुद को भूल जाए 

एक और अदभुत नजारा 


मोबाईल फोटोग्राफी →








इस यात्रा के अन्य भाग भी पढ़े :
पहाड़ियों की रानी दार्जलिंग की सैर

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