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Wednesday, 16 January 2019

सिक्किम में बर्फ के भैंस की सवारी

दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा (2018) - भाग 8



हमारी यह परिवार अन्य लोगों के साथ की गई यात्रा, एक यादगार यात्रा थी. इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ, नीचे इस यात्रा से जुड़ी सभी लिंक भी दे रहा हूँ ताकि आपको इसे ढूंढने में परेशानी न हो.


दिनांक 31.05.2018
दिन के 3:15 बज रहे थे और हमारी गाड़ी बाबा मन्दिर से वापसी कर रही थी. मौसम के बदलते तेवर और ऊँची-ऊँची पर्वतों और वादियों के नैसर्गिक खूबसूरती ने, कैफेटेरिया में पढ़े-लिखे जाहिल जानवरों की वजह से गरम हुए दिमाग को जाने कब का ठंडा कर दिया. अगर आप असमंजस में हैं कि आखिर मैंने ऐसा क्यों कहा तो इस कड़ी को पढ़ें, ताकी आपको मेरी पूरी बात समझ आ पाए. हमें उसी रास्ते से गंगटोक, माल रोड़ वापस जाना था जिस रास्ते से हम आए थे.

छंगू झील (Tsomgo Lake) के पास अदभुत दृश्य 


हमारी गाड़ी हंगू झील (Hangu Lake) से आगे निकली ही थी कि मौसम डरावना होने लगा, बादलों और धुंध ने अब रास्तों को भी घेरना शुरू कर दिया. विजिबिलिटी बिल्कुल कम हो गई जिसकी वजह से आठ-दस फीट के आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. अन्दर से डर भी लग रहा था, सच बोलूं तो फटी पड़ी थी. एक तो गहरे बादलों और धुंध की अटखेलीयाँ, ऊँचें पहाड़ों के सर्पीले रास्ते और ऊपर से हमारे ड्राईवर महोदय की स्पीड वैसे ही तेज, जैसे आते वक्त थी. मैंने ड्राईवर महोदय को एक-दो बार विजिबिलिटी बिल्कुल कम होने की वजह से थोड़ा धीरे गाड़ी चलाने को कहा भी पर वो महोदय अपने ही धुन में मस्त बस लापरवाही से इतना कह देते आप चिन्ता मत करिए, ये सब हम रोज देखते हैं आपको बिल्कुल सही-सलामत आपके होटल छोड़ेंगे. जब भी गाड़ी शार्प कट लेती तेज गति से मुडती और आगे कुछ दिखाई नहीं देता तो डर के मारे जान हलक में आ जाती और गाड़ी को जोर से पकड़ लेता.


कभी-कभी तो मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि प्रकृति के ऐसे रूप को देख एडवेंचर महसूस करूँ या हावी होते डर को सत्य समझूँ या प्रकृति ने जो हमें अपने आगोस में लेकर अपने अलौकिक रूप के दर्शन कराये उसके लिए धन्यवाद करूँ. हमारे बच्चे हम से कहीं ज्यादा मस्ती में एक-एक पल को जी रहे थी, गाड़ी जब किसी बादलों के बड़े समुन्दर को चीरती हुई आगे बढती तो चारों नटखट मिलकर इतने खुश होकर मस्ती में तालियाँ बजाते, नाचते और चीखते कि हमारा डर भी दूर हो जाता. ये नन्हें नादानों को डर छु भी नहीं पा रहे थे. यही गुण अगर हम इन बच्चों से ग्रहण कर ले तो जिन्दगी को देखने का हमारा नजरिया ही बदल जाए और हम जिन्दगी को सही मायने में जी पाएं. हम डरे-सहमें और प्रकृति के अजीबो-गरीब रूप-रंग देख हतप्रद, कई बार तो ऐसा लगा हमने अपनी प्रकृति को इसके रूप-रंग को, इसके लावण्यता को पहली ही बार देखा या यूं कहें हमने आज से पहले कुछ देखा-जाना ही नहीं और जिन्दगी यूं  ही बेकार बीत गई. ऐसे ही आश्चर्यजनक रूप देख अचंभित से हम छंगू झील (Tsomgo Lake) पहुँचे.

छंगू झील (Tsomgo Lake)

बच्चों ने छंगू झील (Tsomgo Lake) से गुजरते वक्त याक देखा था, तो सबको याक की सवारी करनी थी. कुछ ही पलों में 4 बजने वाले थे तो हमने “बर्फ के भैंस” की सवारी न कर सिर्फ बच्चों को ही सवारी कराने का तय किया. याक को “बर्फ के भैंस” के नाम से संबोधित करने से श्रीमतिजी की भौहें तन गई, समझ गया श्रीमतिजी को भी “बर्फ के भैंस” पर सवारी करने का मन हो शायद. थोड़ी देर बाद श्रीमतिजी ने कहा ठीक ही कहा आपने – जब यहाँ के लोग हमारे यहाँ घूमने आयें तो उनको भैंस पर बिठाना चाहिए और सबके ठहाके से छंगू झील का शांत वातावरण गुंजायमान हो उठा, और इस तरह यहाँ हमने  को एक नया नाम दे दिया.  

बर्फ के भैंस पर राजकुमार, पीछे छंगू झील (Tsomgo Lake)

मेरे छोटे राजकुमार की दृष्टी से सबसे सुन्दर लगने वाले “बर्फ के भैंस” यानि याक पर बच्चों की सैर शुरू हुई. बच्चों के चेहरे याक के पास पहुँचते ही आश्चर्यचकित और प्रसन्नता मिश्रित भाव से ओतप्रोत थे. सबसे पहले मेरे दोनों रतनधन दादागिरी कर याक पर सवार हो चुके थे, श्रीमतिजी के बहन के दोनों बच्चे आश्चर्यचकित होकर मुहँ खोले सिर्फ देख रहे थे, आखिर कर भी क्या सकते थे.

वैसे मेरे लिए भी “बर्फ के भैंस” को प्रत्यक्ष देखने का यह पहला ही अवसर था, श्रीमतिजी ने शायद अमरनाथ यात्रा में कहीं इस भैंस को देखा था. सांड जैसा तगड़ा मोटा, लंबे-लंबे काले और सफेद बाल, सींग सुन्दर तरीके से रंगीन सजाई हुई और बैठने के लिए रंगीन जीन ने “बर्फ के भैंस” को खूबसूरत तो बना ही दिया था पर उससे थोड़ी बदबू सी भी महसूस हो रही थी मुझे. पर दूसरी ओर कुछ लड़कियां और औरतें इस भैंसे से ऐसे चिपक-चिपक कर, किस्सी दे-दे कर फोटोसेशन करवा रहीं थी जैसे बिछड़े प्रियतमा से जन्मों-जन्मों के बाद मिलन हो रहा हो. भैंस वाले भाई ने हमें भी वैसे फोटो निकालने को, पर हम से ये न हो सका. आखिर इतनी बदबूदार जानवर को कोई किस्सी देने वाला न था हमारे साथ, तो फोटसेशन कुछ खास न रहा हमारा. मतलब भैंस भाई से हमारी मुलाकात रोमांटिक न हो सकी. बाकी सबको देखकर तो लग रहा था कि हमारी फिल्म में ये मातम का सीन चल रहा है. आखिर मन-मारकर उस खुशनसीब बर्फ के भैंस और बदनसीब लड़कियों और औरतों से नजर हटाया और अपनी कहानी में वापस आ गया. 

अले छोडो मेरे याक को तुम तो घूम लिये बाबा, छंगू झील (Tsomgo Lake)

तो, दोनों राजकुमारों की शान की सवारी निकली और छंगू झील (Tsomgo Lake) के नजारों और अलौकिक वातावरण का आनन्द लेते हुए सड़क पर यहाँ से वहाँ. याक वाले भाई ने दोनों बच्चों को “बर्फ के भैंस” का नाम “रेम्बों” बताया और बच्चों को मस्ती से घूमते-घुमाते बार-बार बता रहा था – “ये कोई ऐरा-गैरा याक नहीं है, सबसे सुन्दर और सबसे सबसे बढ़िया याक है. जिसका नाम “रेम्बों” है”. बच्चे भी रेम्बों-रेम्बों कर चिल्लाते रहे और “बर्फ के भैंस” ओ... ओ.... मतलब याक के सवारी का आनंद लेते रहे. मेरे दोनों बच्चों के बाद दोनों निरीह से बच्चे भी रेम्बों-रेम्बों की रट लगाते लद लिए और मेरे दोनों शैतान रेम्बों-रेम्बों कर डरते-डरते उसे छूने भी रहे. “ये कोई ऐरा-गैरा याक नहीं है, सबसे सुन्दर और सबसे सबसे बढ़िया याक है. जिसका नाम “रेम्बों” है” - ये हमें कई बार सुनने को मिले.

बच्चों की याक की सवारी और मौज-मस्ती के बाद हम वापिस हो रहे थे. लौटने हुए रास्ते में एक पड़ाव हमारा फिर से उस जगह था, जहाँ हमने जैकेट और बूट किराये पर लिए थे. जब तक हमने जैकेट और बूट वापस किए तब-तक ससुरजी के आर्डर किये गए गरमा-गरम मैग्गी भी बड़े से बाउल में हमारे सामने थे. सच पूछो तो पेट में चूहे कूद रहे थे, पर मैं गंगटोक पहुंचकर ही पेट-पूजा की सोच रहा था, दो मिनट में गरमा-गरम मैग्गी बाउल से ऐसे गायब हो गई थी जैसे वहाँ कुछ था ही नहीं. बाकी तो पहले ही बता चुका हूँ कि वहाँ खाने को हमारे लिए कुछ था ही नहीं. सिर्फ मटन और चावल का जुगाड़ था और हम ठहरे 100% शुद्ध शाकाहारी.


यहाँ से निकले तो रास्ते में बैग में पड़े नमकीन और अन्य व्यंजन का लुत्फ़ उठाते हुए पेट की अग्नि को शांत करते हुए, संध्या तक हम गंगटोक अपने होटल पहुँचे. शरीर थककर चूर हो चुका था. श्रीमतिजी ज्यादा परेशान दिख रही थी, क्योंकि मेरे छोटे राजकुमार ने पुरे रास्ते उनकी गोद में ही उधम मचाया कभी गाड़ी की सीट पर बैठे ही नहीं. गाड़ी ने हमें टैक्सी स्टैंड पर छोड़ा था क्योंकि शहर में नो एंट्री के वक्त बाहर जाने वाली गाडियाँ प्रवेश नहीं कर सकती और जैसा आप लोगों को मेरी पोस्ट पढ़कर पता चल ही गया होगा कि सिक्किम में ट्राफिक नियम सिर्फ कड़े  नहीं हैं, बल्कि लोग स्वत: ही इन नियमों का पालन भी करते हैं. यहाँ से हमें लोकल टैक्सी लेकर माल रोड़ पर ही स्थित अपने होटल पहुँचाना था. काफी देर की भाग-दौड़ और मसक्कत के बाद सिर्फ एक गाड़ी मिल पाई, जिसमें सिर्फ चार लोग ही जा सकते थे जो कि यहाँ का नियम है. सबको भेज दिया गाड़ी में बिठाकर, मेरे साथ श्रीमतिजी और मेरे बड़े सुपुत्र रह गए. आधे घंटे तक गाड़ी के लिए भागा-भागी करता रहा पर कोई फायदा न हुआ. एक खाली गाड़ी आती और लोग उसपर ऐसे टूटते जैसे मधुमक्खी अपने छत्ते में टूट पड़ती है. मुझे यह सब करने में बड़ा ही संकोच होता है, सच कहूँ तो ये मुझसे आज तक न हुआ.

आखिर खीजकर पैदल ही गूगल बाबा (मैप) के सहारे हम चल पड़े. 1 किलोमीटर से ज्यादा पैदल खुद को थके होने के बावजूद भी घसीट चुका था तो हमें एक खाली गाड़ी मिली और हम खुश हो लिए. पर हाय रे किस्मत, थोड़ी दूर जाकर ही जाम ऐसे फंसे कि ड्राईवर ने हाथ जोड़ दिए -आगे गया तो बाहर आना मुश्किल है तो आप यहाँ से पैदल ही चले जाइये. ड्राईवर ने पतली सी गली होकर मार्केट तक पहुँचने का शोर्टकट रास्ता बताया, जिसपर पूछते-पाछते हम बेहाल होकर माल रोड़ पर पहुँचे. कई बार तो समझ ही नहीं आ रहा था कि हम रास्ते पर चल रहे हैं या किसी के घर में प्रवेश करने वाले हैं. पहाड़ी रास्ते की तरह ऊपर नीचे जाती सीढियों की वजह से बेटे की हालत क्या हो रही होगी वो हम अपने थकान से अनुभव कर रहे थे. पर थोड़ी न-नुकर के बावजूद भी बेटे ने भी गंगटोक माल तक का लगभग 2 किलोमीटर तक का सफर फ़तेह कर लिया. बाद में पता चला कि जाम कई घंटे तक लगा रहा.

अब पेट में गणपति बाप्पा के मूषकराज उधम मचाये थे, तो सीधा माल रोड़ का रुख किए और माल के मार्केट में ही पतली सी नीचे जाती गली में स्थित मारवारी भोजनालय में छककर भोजन किया. जिसे हमने कल रात चहलकदमी करते वक्त देखा था. बाकी लोग होटल में ही खाना खाने वाले थे. मारवारी भोजनालय के भोजन ने मन तृप्त कर दिया, वरना NJP से लेकर दार्जिलिंग तक तीन दिनों तक जो खाना हमने खाया वो बिल्कुल ही बेस्वाद था और बस जीने के लिए खाने वाली बात हो रही थी. सबसे घटिया खाना हमने दार्जिलिंग के होटल में खाया था. दोनों दिन लेट होने की वजह से और कोई विकल्प नहीं रह जाता था.


चहलकदमी करते मैं, श्रीमतिजी और मेरे सुपुत्र होटल की बढ़ रहे थे की बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें टपकने लगी. वहीँ से एक बड़ा सा छाता ख़रीदा ताकि गीले न हो जाएँ और जल्द से होटल की ओर लपके. वैसे एक बात मैं दार्जिलिंग से नोटिस कर रहा था, यहाँ ज्यादातर इस्तेमाल होने वाले छतरी का आकार-प्रकार हमारे छतरी से काफी बड़ा था. तो बड़ा सा छाता इस यात्रा की निशानी के रूप में हम लोगों की एकमात्र शौपिंग थी. होटल के कमरे में बाकी के लोग भी खाना खा चुके थे और अब तो बस निद्रा देवी के आगोस में समाने को एक अदद बिस्तर की जरूरत थी. जिसकी 5000 रुपल्ली के इस सुइट में कोई कमी नहीं थी.

शुभ रात्रि



आगे जारी ...

यात्रा से लौटते हुए लिये गए फोटो →


ये कोई ऐरा-गैरा याक नहीं है, सबसे सुन्दर और सबसे सबसे बढ़िया याक है. जिसका नाम “रेम्बों” है





रास्ते से दिखता गंगटोक




इसे भी पढ़े:
दार्जलिंग और सिक्किम यात्रा - भाग 2

Monday, 31 December 2018

वर्ष 2018 के यात्राओं का लेखा-जोखा

2018 कुछ मामलों में मेरे लिए खास रहा- पुरे परिवार के साथ लंबी यात्रायें, बाइक द्वारा यात्रा कि शुरुआत, यात्रा वृतांत लिखने की शुरुआत, फोटो प्रितियोगिता में विजेता होना और इन सबसे बड़ी बात एक साहसी सोलो महिला यात्री से मुलाकात. वो साहसी और निडर, अध्यात्मिक सोलो यात्री थी मुम्बई, महाराष्ट्र की मिस ज्योति. जो कई महीनों से सोलो यात्रा कर रहीं हैं और आश्चर्य कि बिहार के दूर-दराज क्षेत्र को भी बड़ी आसानी से नाप डाला.

यह वर्ष कई सुखद अनुभूतियों के साथ विदा हो रहा है और नव वर्ष  का आगाज हो चुका है. नव वर्ष नई उमंगें, नई स्फूर्ति और नई आशाओं के साथ हमारे जीवन में नया सवेरा लेकर आये, इसी शुभकामनाओं के साथ.

नव वर्ष मंगलमय हो !
 
जनवरी -
1st जनवरी (डे विजिट)
फॅमिली ट्रिप
अध्यात्मिक यात्रा
बिहार योग विद्यालय, मुंगेर
रोड ट्रिप कार से
तय दूरी - 108 किमी
हर 1st जनवरी को नव वर्ष का आगाज गुरु आश्रम में अध्यात्मिक और यौगिक अन्तः यात्रा से होती है.
(अब इसकी जगह कुछ नया करें शायद या फिर कुछ भी न करें)
  
बिहार योग विद्यालय का वृहमगम दृश्य
फरवरी -
22 – 24 फरवरी  (डे विजिट)
फॅमिली ट्रिप
धार्मिक और साहसिक यात्रा
त्रिकुट पर्वत एवं बाबाधाम, देवघर 
रोड ट्रिप बस से
तय दूरी - 225 किमी
त्रिकुट पर्वत पर भारत के एक मात्र 45 डिग्री के एंगल पर बने उड़न खटोले (Roap Way) का आनन्द लेने के साथ त्रिकुट पर्वत पर मौजूद कई देवों के स्थान को देखा और ट्रेक्किंग का आनन्द लिया परिवार और छोटे बच्चों के साथ. अगले दिन सुबह भोले के दर्शन के बाद नवलक्खा मन्दिर और संध्या में नंदन पहाड़ में बच्चों ने झूलों और फिर सबने बोटिंग का आनंद लिया. बच्चों की यह पहली मस्ती भरी बोटिंग थी.  
 
त्रिकुट पर्वत उड़न खटोले (Roap Way) का आनन्द 
मार्च –
11 मार्च (डे विजिट)
माँ से साथ
अध्यात्मिक यात्रा
महर्षि मेंहीं आश्रम, कुप्पा घाट, भागलपुर
रोड ट्रिप बाइक से
तय दूरी - 16 किमी
संतमत के प्रवर्तक महर्षि मेंहीं द्वारा स्थापित कुप्पा घाट की माँ की पहली यात्रा. मैं अभी तक कितनी बार आ चुका हूँ शायद गिनती न कर पाऊं. पावन गंगा के तट पर बना कुप्पा घाट शान्ति और अध्यात्म के साथ लोगों के लिए थोड़ी समय के लिए घूम कर शान्ति को महसूस करने का एक महत्पूर्ण स्थल है भागलपुर में. कहा तो यह भी जाता है कि यहाँ कर्ण की मुंगेर के चंडिका स्थान जाने वाली सुरंग भी हैं. वैसे अब पूरी तरह से क्षतिग्रस्त होने की वजह से इसे बन्द कर दिया गया है.
अप्रैल -
4 – 8  अप्रैल
माँ से साथ
लखनऊ यात्रा
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 1505 किमी
रोड ट्रिप कार से
तय दूरी - 100 किमी

लगभग चार साल के बाद नबाबों के शहर लखनऊ जाना हुआ. वैसे तो यह पारिवारिक यात्रा थी पर इसमें भी हमने खुब आनन्द लिया. पहली बार कुकरैल, जिग्नेश मिश्रा पार्क और आंबेडकर पार्क देखने का मौका मिला. कुकरैल में घरियाल प्रजनन केन्द्र है, लखनऊ जैसे भीड़-भाड़ वाले शहर में जंगल का आनन्द आ गया. जिग्नेश मिश्रा पार्क भी खूबसूरती की मिसाल ही है. आंबेडकर पार्क में पार्क जैसा कुछ तो न था पर गरीबों के पैसे और मार्वल जैसे कीमती पत्थर की बर्बादी का बेहतरीन उदाहरण लगा मुझे.
नवाबों के शहर की नवाबी रेलवे स्टेशन 
मई – जून  
28 मई – 02 जून
फॅमिली ट्रिप
हिल स्टेशन और दुर्गम यात्रा
दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 833 किमी
रोड ट्रिप कार से
तय दूरी - 500 किमी
ट्रेक – 12 किमी
परिवार के साथ-साथ ससुराल के लोगों के साथ यह पहली हिल स्टेशन की यात्रा थी, यहाँ खूबसूरती का भरपूर लुत्फ़ उठाया. दार्जिलिंग तो खूबसूरत थी पर गंगटोक और सिक्किम ने जैसे दिल ही चुरा लिया. यही वजह है की 6 महीने बीतने के बाद भी इस यात्रा को बस अभी किया ऐसा महसूस होता है. यह यात्रा मेरी अभी तक की सभी यात्राओं में सबसे बेहतरीन यात्रा रही. गर्मी की छुट्टियों की वजह से यह यात्रा हमारे बजट से बाहर हो गई पर फिर भी हमें इसका कोई मलाल नहीं.
सिक्किम....  मैं फिर आऊँगा मेरी जान. दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा वृतांत को पढ़ने के लिए यहाँ जायें.
नाथुला और बाबा मन्दिर के पहले गर्मी में बर्फ का मजा
जून  -
06 – 08 जून
माँ से साथ
एक गाँव की यात्रा
पूर्णियां,पूर्णियां, बिहार
रोड ट्रिप बस से
तय दूरी - 200 किमी
एक टिपिकल देहात में जाकर दो दिन रहने का मौका मिला जहाँ जाकर पता चला कि बिहार में शराबबंदी तो सिर्फ एक शिगूफा है, गाँव-देहात में अगर विकास हुआ है तो पतन के मार्ग पर. दुखद सत्य के दर्शन हुए. गाँव में सुविधाओं की अब कोई कमी नहीं पर पतन के मार्ग भी फोरलेन की तरह सुपर फास्ट हो गए.

जुलाई  -
24 – 26 जुलाई
माँ से साथ
अध्यात्मिक यात्रा
बिहार योग विद्यालय, मुंगेर
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 100 किमी
रोड ट्रिप ऑटो से
तय दूरी – 20 किमी

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बिहार योग विद्यालय, गंगा दर्शन में प्रवास लगभग 7 – 8  वर्ष बाद हुआ. आनन्द की अनुभूति अपने चरम पर थी, जिसका वर्णन शब्दों से परे है.
गंगा दर्शन में सत्संग 
सितम्बर  -
10 – 13 सितम्बर
माँ से साथ
अध्यात्मिक यात्रा
बिहार योग विद्यालय, मुंगेर
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 100 किमी
रोड ट्रिप ऑटो से
तय दूरी – 20 किमी
सन्यास पीठ की लक्ष्मी-नारायण कार्यक्रम में आश्रम प्रवास कर शामिल होने का परम सौभाग्य पहली बार मिला. आश्रम जीवन को तरसती मेरी आत्मा जल बिल मछली सी हो रही थी, जिसे इस वर्ष गुरु कृपा ने सराबोर कर दिया. अध्यात्मिक और यौगिक जीवन दर्शन का संगम स्थली है गंगा दर्शन और सन्यास पीठ.  

अक्टूबर –
10 अक्टूबर
ऑफिस के बंगाली सहयात्री के साथ
धार्मिक / धरोहर
बटेश्वर स्थान और विक्रमशिला
मेरी पहली बाइक यात्रा
तय दूरी - 100 किमी
ट्रेन कैंसिल होने की वजह से एक लंबी यात्रा रद्द होने से मन खिन्न था, बस बैठे-बैठे पहली बाइक यात्रा का प्लान बना और अगले दिन चल पड़े बटेश्वर स्थान और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की ओर. सन 2008 के बाद दस साल से भी अधिक समय बाद मैंने इतनी लंबी बाइक यात्रा की, वरना मैंने 15-20 किलोमीटर से ज्यादा इन सालों मैं कभी ड्राइव नहीं किया. बटेश्वर स्थान में गंगा स्नान किया, जो की मेरे चंद गिने-चुने गंगा स्नान में सुमार हो गया. बिहार के गौरवशाली इतिहास विक्रमशिला विश्वविद्यालय को देख भाव-विभोर हो उठा. इस यात्रा वृतांत को पढ़ने के लिए यहाँ जायें. 
विक्रमशिला विश्वविद्यालय, कहलगांव, भागलपुर 
अक्टूबर –
14 – 17 अक्टूबर
फॅमिली ट्रिप
अध्यात्मिक यात्रा
रिखिया पीठ, देवघर
रोड
ट्रिप बस से
तय दूरी - 240 किमी
नवरात्रि साधना की लिए अगर आश्रम का परिवेश मिल जाये और साथ में रामायण, भागवत तो क्या कहना. वही हमने पुरे परिवार के साथ इस बार किया. बच्चों को तो जैसे स्वर्ग मिल गया हो, किलकारी, उधम मचाते इनके चेहरे पर खिले फूलों की चमक आ गई थी. उनको रामायण और भागवत से क्या करना, उधम मचाने को विशाल परिसर और मौज-मस्ती पुरे दिन जो करने को मिल गया था.
रिखिया पीठ , देवघर 
नवम्बर –
18 नवम्बर
फॅमिली + सिस्टर फॅमिली ट्रिप
ट्रेक / धार्मिक यात्रा
मंदार हिल
ट्रेन ट्रिप
तय दूरी - 50 किमी
रोड ट्रिप ऑटो से
तय दूरी – 60 किमी
छोटी बहन और बहनोई पधारे और मेरी यात्रा वृतांत का असर था की सीधी फरमाइस “मंदार हिल” जाना है. बस फिर क्या था, मुहूर्त निकाल चल पड़े एक छोटे से ऐडवेंचरस ट्रेक पर, और वो भी तीन 6 और 4 साल के बच्चों के साथ. पिछले साल ही बच्चों के साथ 27 दिसम्बर को मंदार हिल की ट्रेक पिकनिक की तरह की थी. बस बोटिंग रह गई थी सहकर्मी की घर वापसी की व्यग्रता की वजह से, जिसका मजा इस बार लिया गया. बच्चों को तो बहुत मजा आया.
पपहरनी के बीच स्थित लक्ष्मी-नारायण मन्दिर 
दिसम्बर –
25 दिसम्बर
एक साहसी सोलो महिला यात्री के साथ
ट्रेक / धार्मिक यात्रा
मंदार हिल
मेरी दूसरी बाइक यात्रा
तय दूरी - 108 किमी
आभासी दुनिया के लोग जब मिलते हैं और वो भी दो पागल एक ही “घुमक्कडी” धुन के पक्के तो कैसा लगता है, यह आभास 24 – 27 दिसम्बर को जानने का मौका मिला. इस  साहसी, निडर सोलो महिला यात्री ज्योति मोटा के साथ फिर से 25 दिसम्बर को मौका मिला मंदार हिल जाने का, यह दो महीने में मेरी दूसरी बाइक यात्रा हो गई. यहाँ कई नई जानकारी मिली.

मैं और मेरी बसंती (मंदाचल के तलहटी में, पीछे मंदार पर्वत) 
दिसम्बर –
26 दिसम्बर
एक साहसी महिला सोलो यात्री के साथ
धार्मिक यात्रा
जैन मन्दिर, चम्पापुरी
रोड ट्रिप बाइक से
तय दूरी – 14 किमी
भागलपुर की चम्पापुरी जैन धर्म के नक्से पर एक महत्पूर्ण स्थान रखता है, क्योकिं यहाँ 12 वें तीर्थकर के पाँचों कल्याणक यहीं हुए. पर मैं अभी तक आ नहीं पाया था, कारण इन मन्दिरों का लोकल दर्शनार्थियों को रोक-टोक की नीति. खैर, साहसी सोलो महिला यात्री ज्योति मोटा के साथ
पुरे परिवार को मौका मिला यहाँ आने और दर्शन करने का. जैन तीर्थ में चम्पापुरी (जिसे हम नाथनगर कहते हैं) एक अति महत्वपूर्ण तीर्थ है पर जैन मन्दिर सरकार और लोकल प्रशासन की उपेक्षा का शिकार है.
जैन मन्दिर, चम्पापुरी 
दिसम्बर –
27 दिसम्बर
एक साहसी सोलो महिला यात्री के साथ
धार्मिक / धरोहर
बटेश्वर स्थान और विक्रमशिला
मेरी तीसरी बाइक यात्रा
तय दूरी - 108 किमी
10 अक्टूबर के फिर से मौका मिला बटेश्वर स्थान और विक्रमशिला विश्वविद्यालय आने का और कारण थी साहसी सोलो महिला यात्री. मेरी तीसरे बाइक यात्रा कई मायने में बेहतरीन रही. कई नए अनुभव हुए, यात्रा वृतांत लिखा जाना बाकी है.
बटेश्वर स्थान गंगा किनारे श्रद्धा के रंग 

ट्रेन यात्रा कुल दूरी – 2588 किमी
रोड यात्रा कुल दूरी – 1830 किमी (बाइक यात्रा शामिल)
कुल बाइक यात्रा – 330 किमी.




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